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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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केतुवर्णन

कवि वचनसुधा जिल्द १२ नम्बर ४६—१८—७—८१
प्राचीन भारतवर्षीय सिद्धान्तज्ञों का केतु सम्बन्धी विचार।

जो अकस्मात् अग्नि सदृश आकाश मे देख पड़े उसे केतु कहते है, परन्तु खद्योतादि से भिन्न हो। ये केतु तीन प्रकार के होते है—दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम। जिनकी स्थिति न वायु से ऊपर है वे दिव्य, जिन के रूप घोड़े, हाथी, ध्वज, वृक्षादि के सदृश होते है, अर्थात् जो भूवायु से उत्पन्न होते है वे आन्तरिक्ष और इन से भिन्न भौम हैं।

बहुत विद्वान् कहते हैं कि एक सौ एक केतु हैं, कितने कहते हैं कि हजार केतु है, परन्तु नारद मुनि कहते हैं कि यह एक ही केतु है अनेक रूप और स्थान बदल बदल कर दर्शन देता है।

तीन पक्ष के अनन्तर जितने दिनों तक केतुओं का दर्शन होता है उतने मास तक इनका फल होता है और जितने मास तक दर्शन होता है उतने वर्ष तक फल होता है। प्राचीनों ने इन केतुओं के रङ्ग, रूप और उदयास्त पर से सञ्ज्ञा विशेष और उन पर से शुभाशुभ ज्ञान जैसा किया है उसे हम संक्षेप से लिखते है। जिन केतुओं की चोटी सुवर्ण और मणि के सदृश हो और पूरब पश्चिम दोनों दिशाओ मे उदय हों वे रविपुत्र कहलाते है और इनके उदय से राजाओं मे परस्पर विरोध होता है, ऐसे पच्चीस केतु है। जो अग्नि दिशा मे उदय होते है और जिनका रङ्ग लाल होता है वे अग्निपुत्र है, उनके उदय से संसार मे भय होता है उनकी संख्या भी पच्चीस ही है।

जिनकी चोटी टेढ़ी और काली हो ऐसे केतु भी पच्चीस है। ये दक्षिण दिशा मे उदय होते हैं, इनके उदय से मनुष्य बहुत मरते हैं, इनको मृत्युपुत्र कहते हैं। बाईस केतु ऐसे हैं