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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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१८५ मुद्राराक्षस-

देशों पे भी रोग, दुर्भिक्ष से प्रजा को दुख देता है, इसका फल कोई दश मास तक और कोई अठारह मास तक रहता है।

श्वेत और कनाम का केतु ये दोनों साथ ही साथ दिन तक देख पड़ते है, इनका अग्र याम्यभाग मे रहताहै और ५ अर्द्धरात्रि के पूर्व ही इन का दर्शन होता है। ये दोनों सुभिक्ष और कल्याण के देनेवाले हैं।

इन मे यदि केवल केतु का दर्शन हो तो दश वर्ष तक संसार मे महाताप और शस्त्रकोप रहता है, श्वेत केतु जो जटाकार होता, हे यदि रुज हो, आकाश के त्रिभाग मे रहे, और १० लोट कर बाये ओर से आवे तो केवल तृतीयांश प्रजा बचे और सब का नाश हो।

कृत्तिका नक्षत्र मे स्थित हो कर जिस केतु का उदय हो उसे रश्मिकेतु कहते है। इस की चोटी म धूंआ रहता है इसका फल श्वेत कतु के समान है।

१५ ध्रुवकेतु का प्रमाण, वर्ण, आकृति इत्यादि नियत नही होते और दिव्य, आन्तरिक्ष, भौम ये तीनों भेद उस मे पाये जाते है यह अच्छा फल देनेवाला है।

राजाओ की सेना और महलों के ऊपर, वृक्ष पहाड़ और गृहों के ऊपर यह ध्रुवकेतुउनका नाश करने के लिए अकस्मात् २० दर्शन देता है।

कुमुद केतु की श्वेत कुमुद ऐसी कांति होती हे, पश्चिम मे उदय और पूर्व ओर चोटी रहती है, एक ही रात्रि देख पड़ता हे, यह दश वर्ष तक सुभिक्ष करता हे।

मणिकेतु की चोटी दूध ऐसी और सीधी होती है, तारा २५ बहुत सूक्ष्म रहता है, पश्चिम भाग मे केवल एक ही दिन प्रहर तक देख पड़ता है यह साढ़े चार मास तक सुभिक्ष और क्षुद्र जन्तुओं की उत्पत्ति करता है। जलकेतु पश्चिम ओर देख पड़ता