मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in contextकेतुवर्णन । १७३
प्रजापति के आठ पुत्र गणक नाम के है और दो सै चार ब्रह्म- सन्तान चतुर्भुजाकार है । बत्तीस वरुण के पुत्र कङ्का नाम के है, इनमे चन्द्रमा ऐसी कान्ति रहती है । ये केतु बहुत तीव्र फल को देने वाले है, इनका रूप बांस के वृत्तसदृश होता है, छानवे काल के पुत्र है इन का कबन्ध ५ नाम है रूप भी कबन्ध ऐसा होता है, बड़े घोर दारुण फल के देनेवाले हैं। नव केतु केवल विदिशा मे उदय होते है इनका बड़ा और श्वेत तारा होता है, इस प्रकार से हजार केतु का फल गर्ग, पराशर और असित देवलादिकों ने कहा है । अब इन से विशेष केतुओ का फल नीचे लिखते है ।— १० जिस केतु का उदय पश्चिम भाग मे हो और उत्तर भाग में फेला हो, मूर्त्ति चिकनी हो तो उसे बसा केतु कहते है यह तुरन्त ही मरगी करता है परन्तु इस के उदय से सुभिक्ष बहुत होता है । उसी लक्षण के अस्थिकेतु और शस्त्रकेतु भी होते है, १५ परन्तु पहिला रूक्ष और दूसरा पूर्व मे उदय होता है पहिला भयप्रद और दूसरा महामारीकारक है । जो केतु अमावस्या मे उदय होता है और उस की चोटी मे धूम रहता है उसे कपालकेतु कहते हैं यह मरगी, अवर्षण और रोग कारक है और यह आकाश के आधे ही मे रहता है । २० इसी प्रकार का रौद्र नामक केतु है । इस की चोटी नोकीली और ताम्रवर्ण की होती हे, यह आकाश के विभाग मे ही चलता है । चल केतु उसे कहते हैं जिसकी चोटी का अग्र दक्षिण ओर और उंचाई एक अगुल हो और ज्यों ज्यों उत्तर की ओर चले त्यों त्यों बढ़ता जाय, सप्तऋषि अभिजित और २५ ध्रुव को स्पर्श कर फिर लोट कर दक्षिण भाग में अस्त हो और आंधे ही आकाश मे रहै । यह केतु प्रयाग से लेकर अवन्तीपुष्क- रावरण और उत्तर मे देविकानद तक मध्यदेश और अन्य अन्य