नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा
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Read in context[ ७ ] यही कारण है कि इस महाकाव्य के नायक निषधनरेश नल हैं-जो धीर, उदात्त गुणों से युक्त कुलीन क्षत्रिय हैं। प्रेम-पथ बड़ा बीहड़ होता है, उसमें पग-पग पर काँटे बिछे रहते हैं, उन काँटों का निर्मूलन कर नायक-नायिका का सुखान्त मिलन होता है। यही है नैषध चरित की घटना का संक्षेप में वर्णन। नैषध की कथा-वस्तु महाभारतीय नलोपाख्यान (वनपर्व अ० ५२-७६) पर अवलम्बित है। इस ऐतिहासिक प्रणय-कथा को श्रीहर्ष ने अपनी कल्पना-सृष्टि से सजाया है और अपनी प्रतिभा द्वारा उसमें लावण्य का पुट कथावस्तु दिया है। कथासरित्सागर में भी नल दमयन्ती की कथा आती है। यत्र-तत्र उसकी छाया भी नैषध में दिखायी पड़ जाती है। श्रीहर्ष ने जो अपने महाकाव्य को 'शृङ्गारामृतशीतगु' (११, १३०), 'रसाम्भोनिधि' (१४, ५६), 'कृशेतर-रसास्वाद' (१५, ६३), 'अन्याक्षुण्णरस- प्रमेयभणिति' (१०, १६२) 'अतिनव्यकृति' (२१,१६३) आलोचना कहा, सो उपयुक्त ही है। श्रीहर्ष रस का वर्णन करने में अतीव सिद्धहस्त हैं। वे मानव-हृदय के सच्चे पारखी थे। जिस कवि ने मानव-हृदय के भावों को भलीभाँति मनन नहीं किया, वह अपनी रचना में कदापि सफल मनोरथ नहीं हो सकता क्योंकि कविता जीवन की समालोचना है (Poetry is Criticism of Life). विभिन्न दशाओं में जिस प्रकार हृदय के भाव उदय होते हैं, उसी प्रकार उन्हें चित्रित कर देना, सरल कार्य नहीं है। समुचित भाव-चित्रण के लिए अनुभव की आवश्यकता होती है, कोरी कल्पना-शक्ति से काम नहीं चलता। 'कल्पना' और 'अनुभव' ही काव्य-गुम्फन के प्रधान अवयव हैं। इनके बिना न तो काव्य में रस आता है और न कविता ही कामिनी की भाँति प्रिया मालूम होती है। नारी के सौन्दर्य का वर्णन करना कवियों को अतीव अभीष्ट है। वे रमणी के नख से शिख तक रूपराशि के वर्णन करने में अपना सारा कवित्व समाप्त कर देने में रञ्चमात्र भी नहीं हिचकते। हर्ष की बात है कि श्रीहर्ष भी अन्य महाकवियों की भाँति सुभगा-सौन्दर्य के वर्णन करने में पटु हैं। परन्तु इनमें वह विशेषता है, ऐसी मौलिक कल्पना है जो अन्यत्र देखने तक को भी नहीं मिल सकती।