नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
प्रस्तावना एवं नल-दमयन्ती कथा प्रवेश (सर्ग १-२)
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कवि-कुल-कुमुद-कलाधर-श्रीहर्षप्रणीतम् Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri नैषधीयचरितम् [ सर्गत्रयात्मकम् ] सान्वय-संस्कृत-हिन्दीटीकासहितम् महोपाध्यायमल्लिनाथसूरिविरचितया 'जीवातु' व्याख्यया युतम् श्रीमन्नालाल अभिमन्युः, एम० ए०, इत्यनेन कृतया 'मदयन्तिका' हिन्दीटीकया समेतम् प्रकाशकः- छन्नूलाल ज्ञानचन्द पाठक संस्कृत पुस्तकालय, ड़ीगली, बनारस सिटी । मूल्यम्-२) १॥ CC-0. Prof. Satya Vrat Shastri Collection.
प्रकाशक:-- बृजलाल ज्ञानचन्द्र गुप्त अध्यक्ष, संस्कृत पुस्तकालय, कचौड़ीगली, बनारस सिटी। मास बुक
समर्पण पत्र लब्धप्रतिष्ठ स्वदेशव्रतानुरागी, सुर-भारती के अनन्य उपासक, सुप्रसिद्ध ग्रन्थकार, पत्रकार-व्योम के राका शशी, प्राच्य-पाश्चात्यभाषाविद्, विविधगुणगणालङ्कृत, कला-कानन-विहरणशीलकृष्णसार, लोकप्रिय नेता, कमला एवं सरस्वती के मूर्तिमान् अवतार, उत्तर प्रदेशीय सूचना तथा सिंचाई सचिव माननीय पण्डित श्रीकमलापतिशास्त्री महोदय के कोमल कर-कमलों में 'मदयन्तिका' टीका सहित नैषध चरित का यह संस्करण सादर, सस्नेह समर्पित समर्पक — मन्नालाल अभिमन्यु
ॐ वन्दे मातरम् ॐ भूमिका संस्कृत-साहित्य-क्षितिज में तीन बृहन्नक्षत्र अपनी कमनीय कान्ति बिखेर रहे हैं। ‘नैषध, किरातार्जुनीय तथा शिशुपालवध’ नामक बृहत्त्रयी का अखिल विद्वद्वर्ग में अतीव आदर है। संस्कृत-साहित्याटवी में अगणित महाकाव्य-मृगाधिपों के होते हुए भी हमारा भारतीय समाज इसी बृहत्त्रयी के अध्ययन में अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग करता है। संस्कृत महाकाव्य में व्युत्पत्ति पैदा करने के समुद्देश्य से बृहत्त्रयी का मनन करना नितान्त आवश्यक है। इसके अशेषतः अध्ययन से, न केवल शब्दकोष में ही वृद्धि होती है, प्रत्युत नवीन रस भाव भङ्गी का परिज्ञान अत्युच्च कोटि का हो जाता है। परन्तु इधर कुछ दिनों से खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस प्रणाली में विश्रृंखला उत्पन्न हो गयी है। जिनकी धवल कीर्ति-कौमुदी से आज दिन भी धरा-धाम प्रकाशमान हो रही है उन कविता-कामिनी-कान्त श्रीहर्ष के नाम से ऐसा कौन सुर-भारती-सेवी है जो परिचित न हो, अथवा जिसके कर्ण-कुहर में यह नाम न गया हो? श्रीहर्ष को महा- कवि जयदेव अपने प्रसन्नराघव नाटक की प्रस्तावना में कविता-कामिनी का हर्ष कहते हैं। महाकवि के शब्दों में— यस्याश्चौरश्चिकुरनिकुरः, कर्णपूरो ‘मयूरः’ ‘भासो’ हासः, कविकुलगुरुः ‘कालिदासो’ विलासः । ‘हर्षो’ हर्षो हृदयवसतिः पञ्चबाणस्तु ‘बाणः’ केषां नैषा कथय कविता-कामिनी-कौतुकाय ॥ किस सहृदय के हृदय को श्रीहर्ष की कविता-कामिनी की कमनीय कान्ति नहीं लुभाती ? अलङ्कारों की रमणीयता, भाषा का लावण्य, भाव का सौष्ठव, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, पदों की कोमल कान्त अवली, श्लेषों की अक्लिष्टता, प्रसादादि गुणों की गरिमा—इन सब ने मिल कर, श्रीहर्ष को कविता-कामिनी का वस्तुतः
हर्ष बना दिया । श्रीहर्ष काव्य-कला के कुशल कुलपति हैं; मानव-हृदय की सूक्ष्म अनुभूतियों के सच्चे पारखी हैं; चरित्र-चित्रण करने के अद्भुत चित्रकार हैं। इनकी तूलिका इतनी मँजी-मँजायी है कि कहीं भी अस्वाभाविक वर्ण को स्थान नहीं। भगवती त्रिपुरा से प्राप्त अपने अगाध पाण्डित्य को श्रीहर्ष ने कविता- कामिनी के कोमल कर-कमलों में अर्पित कर दिया । श्रीहर्ष की कविता-कामिनी रुचिर वर्ण तथा पद से युक्त है; रस-भाव से परिपूर्ण है; कृत्रिमता से कोसों दूर है; और तरुणी नायिका की भाँति अखिल तरुणवृन्द के हृदय को हठात् अपनी ओर आकर्षित करती है । श्रीहर्ष की रस- भाव-मयी कविता के अधर का आस्वादन कर, सहृदय भावुकजनों के हृत्पयोधि में हर्ष की लहरी अठखेलियाँ करने लगती हैं। जिस प्रकार अनङ्ग अङ्गना के द्वारा अखिल विश्व को मोहित करता है, उसी प्रकार श्रीहर्ष की कविता की शब्द-शय्या अपने सौष्ठव, सौन्दर्य, सौकुमार्य द्वारा काव्य-कानन-विहरण-शील पुरुषों के मन को उद्वेलित करती है। उनकी कविता में एक आश्चर्यजनक अनूठापन है। थोड़ा पढ़ लेने पर, अधिक जाननेकी, आगे बढ़ने की, एक मधुर वेदना हृदय में उठती है । उन्हीं महाकवि का नैषध काव्य सन्तप्त-हृदय काव्यपिपासुओं के लिए सुधा की निर्झरिणी है, भारतीय चातकों के लिए स्वाती की बूँद है, राष्ट्र के लिए गर्व की वस्तु है और विश्व को अनुपम देन है । यद्यपि यह कहा गया है कि— 'उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् । दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः ॥' तथापि विद्वद्वर्ग उच्च स्वर से पाञ्चजन्य घोष करता है कि— 'उदिते नैषधे काव्ये क्व माघः ? क्व च भारविः ?' इसकी पुष्टि निम्नाङ्कित उक्ति से भी होती है कि— 'नैषधं विद्वदौषधम् ।' आइये, ऐसे विद्वत्कुलचक्रचूडामणि के सम्बन्ध में परिचय प्राप्त कीजिए । यह बात तो लोक-प्रसिद्ध है कि संस्कृत-साहित्य के महाकवियों ने अपने सम्बन्ध में या तो लिखा ही नहीं है, या इतना स्वल्प लिखा है कि उनके जीवन की कुछ महान् घटनाएं अस्पष्ट सी रह जाती हैं। जीवनवृत्त हर्ष की बात यह है कि श्रीहर्ष ने अपने महाकाव्य के प्रति सर्ग के अन्तिम श्लोक में अपने माता-पिता का नाम,
[ ३ ] अपनी रचनाओं के अन्त में उन्होंने अपने आश्रयदाता की ओर मूक सङ्केत किया है। इसके अतिरिक्त राजशेखर सूरि ने सन् १३४८ ई० में रचित अपने 'प्रबन्धकोष' में श्रीहर्ष का संक्षिप्त जीवनचरित दिया है। अतः प्राप्त-सामग्री के आधार पर उनका जीवन चरित लिखने का प्रयास किया जा रहा है। श्रीहर्ष के पिता का नाम श्रीहीर तथा माता का नाम श्री मामल्ल देवी था। श्रीहीर वस्तुतः कवि-राज-राजि-मुकुटालङ्कार के हीरक मणि थे। वे काशी के गहरवार- नरेश श्रीविजयचन्द्र के सभापण्डित थे। एक बार वे सभा में मिथिला के प्रसिद्ध नैयायिक श्रीउदयनाचार्य से शास्त्रार्थ में हार गये। इससे उन्हें अत्यन्त मार्मिक पीडा हुई। वे सुरलोक की यात्रा करते समय अपने पुत्र से कह गये कि हे बेटा ! मुझे अपनी पराजय का अतीव क्लेश है। मैं परलोक में भी शान्ति एवं सद्गति न प्राप्त कर सकूँगा। अतः मैं तुम्हें उसी दिन अपना सुपुत्र मानूंगा—जिस दिन तुम अपने पिता के विजेता पण्डित को शास्त्रार्थ में पराजित कर, अपने पिता के अप- मान का बदला लोगे। इस परीक्षा-पाथोधि में सफल मनोरथ होने के लिए श्रीहर्ष ने भगवती जाह्नवी के तट पर बैठ कर, साल भर तक चिन्तामणि मन्त्र का जाप किया। जिससे प्रसन्न होकर भगवती त्रिपुरा ने उन्हें साक्षात् दर्शन देकर, पाण्डित्य के अगाध सागर होने का अमोघ वरदान दिया। उन्हें असाधारण कवित्व शक्ति प्रस्फुरित हुई और वे तत्काल विजयचन्द्रदेव की राजसभा में गये। जाते ही उन्होंने राजा का इन श्लेषात्मक वाक्यों द्वारा अभिनन्दन किया— गोविन्दनन्दनतया च वपुःश्रिया च माऽस्मिन् नृपे कुरुत कामधियं तरुण्यः। अस्त्रीकरोति जगतां विजये स्मरः स्त्री-स्त्री जनः पुनरनेन विधीयते स्त्री ॥ इसे सुनकर समस्त सभासदों के साथ महाराज बड़े प्रसन्न हुए। उनके अगाध पाण्डित्य को देखकर, उनके पिता के विजेता ने भी सर्वतोभावेन अपनी पराजय स्वीकार कर ली। इस प्रकार पिता की अन्तिम आज्ञा का पालन कर, वे पितृ-ऋण से उन्मुक्त हो, उन्होंने पिता का वाङ्मय तर्पण किया। तत्पश्चात् वे जयचन्द्र की सभा में स-सम्मान निवास करने लगे। उन्होंने राजा के अत्यन्त आग्रह करने पर नैषधचरित की रचना की। श्रीहर्ष के सम्बन्ध में एक किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि ये काव्य-प्रकाश-रचयिता श्रीमम्मटाचार्य के भागिनेय थे। वे अत्यन्त वृद्ध हो गये थे। जब इनका नैषध-
[ ४ ] प्रसिद्ध है कि श्रीहर्ष ने अपने ग्रन्थ को उस समय के परम-विख्यात आलोचक दन्तकथा श्रीमम्मट के सम्मुख रखकर, उनकी सम्मति के लिए वाञ्छा प्रकट की। आचार्य मम्मट ने पुस्तक को सावधानी के साथ पढ़ने के लिए रख लिया और अपनी सम्मति प्रदान करने के लिए दूसरे दिन बुलाया। जब ये दूसरे दिन पहुँचे तब उन्होंने इन शब्दों में मार्मिक चुटकी ली कि 'हे हर्ष ! यदि तुम्हारा काव्य मुझे काव्य-प्रकाश-प्रणयन के पूर्व मिला होता तो सप्तम उल्लास लिखने के लिए, संस्कृत-साहित्याटवी के गहन-ग्रन्थों में से दोषान्वेषण करने का प्रयास न करना पड़ता, और एक इसी में सम्पूर्ण दोषों के दृष्टान्त मुझे मिल गये होते।' इस पर श्रीहर्ष ने कहा कि आप एकाध उदाहरण तो बतलाइए तब उन्होंने नैषध (२, ६२) का यह श्लोक सामने रख दिया-- तव वर्त्मनि वर्ततां शिवं पुनरस्तु त्वरितं समागमः । अयि साधय साधयेप्सितं स्मरणीयाः समये वयं वयः ॥ अर्थात् तुम्हारा यह श्लोक मङ्गल के स्थान पर अमङ्गल का सूचक है। पदच्छेद में किञ्चित् विभिन्नता कर के इसे पढ़ो और देखो कि वस्तुतः बात ठीक है या नहीं ? तव वर्त्म निवर्ततां शिवं, पुनरस्तु त्वरितं स माऽऽगमः । अयि साध्यसाधयेप्सितं स्मरणीयाः समये वयं वयः ॥ अर्थः-तुम्हारा कल्याणदायक मार्ग बदल जाय। तुम फिर कभी लौटो ही नहीं। हे आधिसहित ! मेरे अभीष्ट को मत पूरा करो। हे पक्षी ! हमारे परलोक वासी होने के बाद समय-समय पर हमारा स्मरण कर लिया करना। इस प्रकार अपने मामा की व्यङ्ग्यपूर्ण सम्मति सुन कर, श्रीहर्ष खिन्नचित्त हो चुपचाप लौट आये। यह घटना सत्य है, किं वा असत्य-इस सम्बन्ध में भी विभिन्न मत हैं। अस्तु, मैंने प्रचलित जनश्रुति का उल्लेख कर दिया। श्रीहर्ष ने नैषध के अन्त में लिखा है कि- कालनिर्णय ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरात् । इस से स्पष्ट है कि कान्यकुब्जेश्वर इनकी बड़ी प्रतिष्ठा करते थे। अब यह प्रश्न उठता है कि इनके आश्रयदाता कान्यकुब्जेश्वर का क्या नाम था ? तो उपर्युक्त प्रसङ्ग से आप को स्पष्ट हो गया होगा कि गहर-वार-राजपूत-कुल-भूषण
[ ५ ] विजयचन्द्र तथा जयचन्द्र के ये सभापण्डित थे । इस प्रकार इनका अविर्भाव-काल द्वादश शताब्दी का उत्तरार्द्ध ठहरता है । ये सकल शास्त्रनिष्णात, अतीव मेधावी, वादविवाद में अकुण्ठित बुद्धि सम्पन्न, ओजस्विनी वक्तृतादाता एवं अप्रतिभट पण्डित थे । यह बात पिता के पराजित करनेवाले का इनके द्वारा पराजित हो जाना, स्पष्ट करती श्रीहर्ष की योग्यता है । इनकी रचनाओं का आदर उद्भट कवि-कुल-निवास- स्थल काश्मीर में हुआ था । यथा — काश्मीरैर्महिते चतुर्दशतयीं विद्यां विदद्भिः महा०’ ( १६, १३० ) इस सम्बन्ध में भी एक जनश्रुति है कि ये किस प्रकार काश्मीर गये, किस प्रकार रचना-परीक्षा हुई, किस प्रकार काश्मीर नरेश की सभा में पहुँचे और किस प्रकार उन्हें पारितोषिक प्राप्त हुआ, आदि । परन्तु स्थानाभाव के कारण इसका उल्लेख नहीं करूंगा । ये न केवल काव्यमर्मज्ञ थे, प्रत्युत महायोगी थे और समाधि- अवस्था में परम ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे । यथा— यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परं ब्रह्म प्रमोदार्णवम् । सत्रहवें सर्ग में कलि के मुख से समस्त आस्तिक मतों का खण्डन कराना तथा इन्द्र यम अग्नि वरुण द्वारा उनका निराकरण करना — इनके विलक्षण पाण्डित्य का द्योतक है । इन्होंने कलि के मुख से पाणिनि के एक सूत्र की विचित्र व्याख्या करा डाली है । इनकी कल्पना एकदम निराली है । देखिए— उभयी प्रकृतिः कामे सजेदिति मुनेर्मनः । अपवर्गे तृतीयेति भणतः पाणिनेरपि ॥ (नैषध, १७,७०) स्त्री तथा पुरुष प्रकृति दोनों काम (-उपभोग ) में ही आसक्त रहा करें । जो स्त्री-पुरुष के लक्षणों से युक्त हैं तथा मैथुन में समर्थ हैं वे ही कामोपभोग के अधि- कारी हैं । अपवर्ग (मोक्ष) तो केवल तृतीया प्रकृति-नपुंसकों-के लिए ही है । जो नपुंसक हैं, मैथुन कर्म में अशक्त हैं वे ही तीर्थयात्रा आदि करके मोक्ष का साधन करें । 'अपवर्गे तृतीया' सूत्र बनाकर पाणिनि ने भी इस बात को स्वीकार किया है । ये कामशास्त्र के कितने गहन विद्वान् थे— यह नैषध के अन्तिम पाँच सर्गों के पढ़ने से स्पष्ट होता है ।
[ ६ ] श्रीहर्ष ने कई ग्रन्थरूपी पुष्प-स्तबकों द्वारा सुर-भारती की आराधना की है। सम्पूर्ण शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन करके, तत्तद्विषयों का प्रतिपादन जितना सुन्दर ढंग से इन्होंने किया है, उस भाँति किसी अन्य ने नहीं किया ग्रन्थ— है। इनके बनाये हुए ग्रन्थों की तालिका नैषधीय चरित में ही दी गयी है। यथा— १ स्थैर्यविचारप्रकरण (नैषध ४, १२३) २ विजय-प्रशस्ति (५, १३८) ३ खण्डनखण्डखाद्य (६, ११३) इसमें अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इसकी टक्कर का कोई दूसरा ग्रन्थ अखिल वेदान्त-जगत् में नहीं है। यह वेदान्तशास्त्र का अनुपम हीरक मणि है और श्रीहर्ष की अलौकिक दार्शनिक पटुता का उच्च स्वर से डिण्डिम घोष कर रहा है। इस उच्चकोटि के ग्रन्थ के अध्ययन- अध्यापन से विलक्षण प्रतिभा उत्पन्न होती है। काव्य-जगत् में जो स्थान नैषध का है, वही स्थान दर्शन-ग्रन्थों में खण्डनखण्डखाद्य को प्राप्त है। इसका मङ्गला- चरण बड़ा भव्य है— अविकल्पविषय एकः, स्थाणुः पुरुषः श्रुतोऽस्ति यः श्रुतिषु । ईश्वरमुमया न परं, वन्देऽनुमयाऽपि तमधिगतम् ॥ ४ गौडोर्वीश-कुल-प्रशस्ति (७, ११०) ५ अर्णववर्णन (६, १६०) ६ छिन्द प्रशस्ति (१७, २२२) ७ शिवशक्तिसिद्धि (१८, १४८) ८ नवसाहसाङ्क चरित चम्पू (२२, १५१) ९ नैषधीय चरित—इसमें निषध-नरेश महाराज नल का चरित्र अत्यन्त अलौकिक रीति से वर्णन किया गया है इसके प्रत्येक सर्ग में प्रायः १०० से अधिक श्लोक हैं। इस महाकाव्य में २२ सर्ग हैं। कुछ विद्वानों का कथन है कि नैषध में और भी सर्ग रहे होंगे—जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं। इसमें प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन प्राचुर्य के साथ किया गया है। उसमें अनुपम वैचित्र्य है। इसके पढ़ने से स्पष्ट प्रतिभासित होता है कि महाकाव्य के अशेष लक्षणों को सन्निविष्ट कर, उनको चरितार्थ करने ही के दृष्टिकोण से महाकवि अपनी रचना में प्रवृत्त हुआ है। महाकाव्यों का प्राकृतिक वर्णन भी एक आवश्यक अङ्ग है। इस नियम के अनुसार कवि ने उसको स्थान दिया है; पर प्रचलित परिपाटी या पुस्तकों के आधार पर प्रकृति-वर्णन नहीं किया है। प्रकृति-प्रमदा के रूप एवं भावों की छुटा का भली- भाँति निरीक्षण कर, अनुभव के द्वारा उसके प्रत्येक अवयव को सजाया है।
[ ७ ] यही कारण है कि इस महाकाव्य के नायक निषधनरेश नल हैं-जो धीर, उदात्त गुणों से युक्त कुलीन क्षत्रिय हैं। प्रेम-पथ बड़ा बीहड़ होता है, उसमें पग-पग पर काँटे बिछे रहते हैं, उन काँटों का निर्मूलन कर नायक-नायिका का सुखान्त मिलन होता है। यही है नैषध चरित की घटना का संक्षेप में वर्णन। नैषध की कथा-वस्तु महाभारतीय नलोपाख्यान (वनपर्व अ० ५२-७६) पर अवलम्बित है। इस ऐतिहासिक प्रणय-कथा को श्रीहर्ष ने अपनी कल्पना-सृष्टि से सजाया है और अपनी प्रतिभा द्वारा उसमें लावण्य का पुट कथावस्तु दिया है। कथासरित्सागर में भी नल दमयन्ती की कथा आती है। यत्र-तत्र उसकी छाया भी नैषध में दिखायी पड़ जाती है। श्रीहर्ष ने जो अपने महाकाव्य को 'शृङ्गारामृतशीतगु' (११, १३०), 'रसाम्भोनिधि' (१४, ५६), 'कृशेतर-रसास्वाद' (१५, ६३), 'अन्याक्षुण्णरस- प्रमेयभणिति' (१०, १६२) 'अतिनव्यकृति' (२१,१६३) आलोचना कहा, सो उपयुक्त ही है। श्रीहर्ष रस का वर्णन करने में अतीव सिद्धहस्त हैं। वे मानव-हृदय के सच्चे पारखी थे। जिस कवि ने मानव-हृदय के भावों को भलीभाँति मनन नहीं किया, वह अपनी रचना में कदापि सफल मनोरथ नहीं हो सकता क्योंकि कविता जीवन की समालोचना है (Poetry is Criticism of Life). विभिन्न दशाओं में जिस प्रकार हृदय के भाव उदय होते हैं, उसी प्रकार उन्हें चित्रित कर देना, सरल कार्य नहीं है। समुचित भाव-चित्रण के लिए अनुभव की आवश्यकता होती है, कोरी कल्पना-शक्ति से काम नहीं चलता। 'कल्पना' और 'अनुभव' ही काव्य-गुम्फन के प्रधान अवयव हैं। इनके बिना न तो काव्य में रस आता है और न कविता ही कामिनी की भाँति प्रिया मालूम होती है। नारी के सौन्दर्य का वर्णन करना कवियों को अतीव अभीष्ट है। वे रमणी के नख से शिख तक रूपराशि के वर्णन करने में अपना सारा कवित्व समाप्त कर देने में रञ्चमात्र भी नहीं हिचकते। हर्ष की बात है कि श्रीहर्ष भी अन्य महाकवियों की भाँति सुभगा-सौन्दर्य के वर्णन करने में पटु हैं। परन्तु इनमें वह विशेषता है, ऐसी मौलिक कल्पना है जो अन्यत्र देखने तक को भी नहीं मिल सकती।
[ ८ ] दमयन्ती के केशकलाप से लेकर चरण पर्यन्त सर्वाङ्ग वर्णन २, २० से लेकर २, ६६ तक पढ़िए। शृङ्गार रस की सरसता देखते ही बनती है। पढ़नेवाला उस रस में आचूड सराबोर हो जाता है। सम्भोग शृङ्गार तथा विप्रलम्भ शृङ्गार कवियों के मनोरञ्जक विषय हैं। विप्रलम्भ के करुणमय वर्णन के बिना वे अपने को कृतकार्य नहीं समझते। श्रीहर्ष के काव्य में सम्भोग का प्रकाशमान रूप हमारे हृदय में हर्ष-कहार उत्पन्न करता है और विप्रलम्भ की करुणमूर्ति हमारे अन्तःकरण में उसी प्रकार करुणा उत्पन्न करती है, जिस प्रकार पराधीन भारत में पिकेटिङ्ग करती हुई महिलाओं के प्रति शासन-शकट का दुर्व्यवहार। श्रीहर्ष ने नल-दमयन्ती के सम्भोग वर्णन करने में पाठकों को सम्भोग की चासनी चखायी है। हंस को दूत बनाकर भेजने में नल ने उससे जो विरह-वेदना व्यक्त की है, उससे विप्रलम्भ की छटा देखते ही बनती है। हंस का विलाप (१, १३५ से १, १४२ तक) करुणरस का सर्वोत्तम निदर्शन है। हमारे कवि को इसमें पूर्णतया सफलता मिली है। हंस कितने मार्मिक शब्दों में कहता है— मदेकपुत्रा जननी जरातुरा नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी। गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयन्नहो विधे ! त्वां करुणा रुणद्धि नो ॥ आप इसे ज्यों ज्यों पढ़ते जाइए त्यों त्यों हृदय पर इतना प्रभाव पड़ता है कि अन्त में आँखों को भी दो बूँद आँसू गिराना पड़ता है। धन्य है, कवि की वर्णनात्मक शैली को। कविता-शैली अपने ढंग की अनुपम है। वह कृत्रिम नहीं, प्रत्युत अलङ्कृत है। प्रत्येक वर्णन, प्रत्येक भाव साधारण शब्दों में (उवाच, अपश्यत्) न हो कर अलङ्कृत भाषा ( 'अमोचि चञ्चुपुटमौनमुद्रा'-३, ६६; 'अक्षिलक्षीचकार,— २, १०७) में है। अलङ्कारों के चयन में भी श्रीहर्ष ने कमाल किया है। उपमा के जो प्रधान गुण विषय को मर्मस्पर्शी एवं विशद बनाना, काव्य-सौन्दर्य को बढ़ाना आदि है— वे गुण श्रीहर्ष की रचना में पाये जाते हैं, उनका पूर्ण विकास उनकी अतुलनीय उपमाओं में हुआ है। उपमाओं की लड़ी टूटती नहीं, उनकी उपमाएं एक से एक बढ़ कर अद्वितीय कल्पनामयी हैं। उनकी उपमा की अनुरूपता तथा नवीनता
[ ६ ] के सम्बन्ध में निःसङ्कोच कहा जा सकता है कि अखिल संस्कृत-साहित्य-संसार में उसके टक्कर की दूसरी नहीं। प्रत्येक श्लोक में शब्दश्लेष किंवा अर्थश्लेष पाया जाता है। हमारे पण्डित-समाज में 'पञ्चनली' ( १३, ३४ ) तो प्रसिद्ध है— जहाँ एक श्लोक से पाँचों नलों का वर्णन किया गया है। क्या विश्व की किसी भी भाषा में यह सम्भव है ? श्रीहर्ष की कविता की शैली उत्कृष्ट वैदर्भी है। वैदर्भी की प्रशंसा में वे स्वयं कहते हैं कि— धन्यासि वैदर्भि ! गुणैरुदारैः ( ३, ११६ ) श्रीहर्ष की कविता नैसर्गिक सरिता के तुल्य है, कृत्रिम नहर की भाँति नहीं, जिसकी धारा का प्रवाह बड़े वेग से बहता चला जा रहा है। इनकी कविता में माधुर्य तथा प्रसाद गुण कूट-कूट कर भरे हुए हैं। सुन्दर अर्थों की कमनी- यता अतीव मुग्धकारिणी है। इनका काव्य मौलिक अर्थों की खान है; उसमें अर्थों का पिष्टपेषण नहीं; सर्वत्र नवीन अर्थों का समावेश है। स्थानाभाव के कारण उनकी कविताओं की बानगी और सूक्तियाँ नहीं दी जा रही हैं। आशा है, हमारे पाठक महोदय क्षमा करेंगे। म० म० मल्लिनाथ की 'जीवातु' टीका के साथ यह संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। मूल में आये हुए शब्दों को स्थूलाक्षरों में और टीका में आये हुए पर्यायवाची शब्दों को सूक्ष्माक्षरों में दिया गया है-जिस से प्रस्तुत संस्करण अन्वय स्पष्ट हो जाता है। इस अभिनव शैली से छात्रों का बड़ा उपकार होगा। छात्रों को मूल श्लोक लग जाय-इस अभिप्राय से मैंने श्लोकों का शब्दार्थ देते हुए, उन्हीं के दृष्टिकोण से हिन्दी में अनुवाद किया है। मैं अपने प्रयास में कहाँ तक सफल हुआ--इसकी परख विद्यार्थी गण अपनी निकष-ग्रावा पर करें। साथ ही जो इसमें त्रुटि रह गयी हो, उसके लिए बारम्बार क्षमा प्रार्थी हूँ। अन्त में उत्तर प्रदेशीय सरकार के सूचना तथा सिंचाई सचिव पण्डितवर श्री कमलापति त्रिपाठी जी को धन्यवाद देना अपना परम सौभाग्य समझता हूँ, जिन्होंने मेरी भेंट स्वीकार कर, अपने वंशक्रमानुगत सौजन्य का परिचय दिया है। काशी दीपावली सं० २००९ } मन्नालाल अभिमन्यु
ॐ श्रीमहागणाधिपतये नमः ॐ नैषधमहाकाव्यम् जीवातु-मदयन्तिका-संस्कृत-हिन्दीटीकासहितम् । प्रथमः सर्गः निपीय यस्य क्षितिरक्षिणः कथां तथाद्रियन्ते न बुधाः सुधामपि । नलः सितच्छत्रितकीर्त्तिमण्डलः स राशिरासीन्महसां महोज्ज्वलः ॥१॥ अथ तत्रभवान् श्रीहर्षकविः 'काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥' इत्यालङ्कारिकवचनप्रामाण्यात् काव्यस्यानेकश्रेयःसाधनत्वाच्च काव्यालापांश्च वर्जयेदिति तन्निषेधस्यासत्काव्यविषयतां पश्यन् नैषधाख्यं महाकाव्यं चिकीर्षुश्चिकीर्षितार्थाविघ्नपरिसमाप्तिहेतोराशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखमित्याशीराद्यन्यतमस्य प्रबन्धमुखलक्षणात् कथानायकस्य राज्ञो नलस्य भूतिलक्षणं परम-मङ्गलं वस्तु निर्दिशति-निपीयेति । क्षितिरक्षिणः= क्षमापालस्य यस्य=नलस्य कथाम्=उपाख्यानं, निपीय=नितरामास्वाद्य । 'पीड् स्वादे क्त्वो ल्यप्'इति ल्यबादेशः । न तु पिबतेः न ल्यपीति प्रतिषेधादीत्वासम्भवात् । बुधाः=तज्ज्ञाः, सुराश्च । 'ज्ञातृचान्द्रिसुरा बुधाः' इति क्षीरस्वामी । सुधामपि तथा= यथेयं कथा तद्वदित्यर्थः । नाद्रियन्ते=सुधामपेक्ष्य बहु मन्यन्ते इति यावत् । [ सितच्छत्रितकीर्तिमण्डलः ] सितच्छत्रितं सितच्छत्रं कृतं सितातपत्रीकृत- मित्यर्थः । 'तत्करोतीति' ण्यन्तात् कर्म्मणि क्तः । कीर्त्तिमण्डलं येन सः । महसां=तेजसां, राशिः=रवैरिवेति भावः । [ महोज्ज्वलः ] महैः उत्सवैः उज्ज्वलः दीप्यमानः, नित्यमहोत्सवशालीत्यर्थः । 'मह उद्धव उत्सवः' इत्यमरः । स=नलः आसीत् । अत्र नले महसां राशिरिति कीर्त्तिमण्डले च सितच्छत्रत्वरूपस्या- रोपात् रूपकं कथायाश्च सुधोपेक्षयाऽऽधिक्योक्तेर्व्यतिरेकश्चेत्यनयोः संसृष्टिः । तदुक्तं दर्पणे-रूपकं रूपितारोपाद् विषये निरपह्नवे' इति । 'आधिक्यमुपमेयस्योपमानान्न्यून-
२ नैषधचरितम् । [ प्रथमः ताऽथवा । व्यतिरेक इति मिथोऽपेक्षायै तेषां स्थितिः संसृष्टिरुच्यते' इति च । अस्मिन् सर्गे वंशस्थं वृत्तं, जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जराविति तल्लक्षणात् ॥ १ ॥ जिस नरपति के उपाख्यान का रसास्वाद कर, बुध-जन (विद्वान् तथा विबुध गण) अमृत का भी वैसा समादर नहीं करते थे (जैसा उसकी मधुर कथाओं का करते थे)-ऐसे कीर्तिमण्डल को अपना श्वेतछत्र बनानेवाले, तेजशाली (सूर्य के समान), और महोज्ज्वल (नित्य उत्सव करनेवाले) नल नाम के एक राजा थे ॥१॥ रसैः कथा यस्य सुधावधीरिणी नलः स भूजानिरभूद्गुणाद्भुतः । सुवर्णदण्डैकसितातपत्रितज्वलत्प्रतापावलिकीर्त्तिमण्डलः ॥२॥ इममेवार्थमन्यथा आह-रसैरिति । यस्य=नलस्य कथा रसैः=स्वादैः । 'रसो गन्धः रसः स्वाद' इति विश्वः । [सुधावधीरिणी] सुधाम् अवधीरयति तिरस्करोति तथोक्ता, अमृतातद्रिच्यमानस्वादेति यावत् ताच्छील्ये णिनिः । [भूजानिः] भूर्जाया यस्य स भूजानिः, भूपतिरित्यर्थः । जायाया निङिति बहुव्रीहौ जायाशब्दस्य निडादेशः । स नलः [गुणाद्भुतः] गुणैः शौर्यदाक्षिण्यादिभिः अद्भुतः, लोकातिशयमहिमेत्यर्थः । अभूत् । कथम्भूतः ? [सुवर्णदण्डैकसितातपत्रितज्वलत्प्रतापावलिकीर्त्तिमण्डलः] सुवर्णदण्डश्च एकं सितातपत्रञ्च ते कृते । द्वन्द्वात् तत्कृताविति ण्यन्तात् कर्मणि क्तः । ज्वलत्प्रतापावलिः कीर्त्तिमण्डलञ्च यस्य तथाभूतः । अप्रतिहतकीर्तिप्रताप इत्यर्थः । इह कीर्तेः सितातपत्रत्वरूपणं पूर्वोक्तमपि सुवर्णदण्डवैशिष्ट्यात् राज्ञश्च गुणाद्भुतत्वेन वैचित्र्यात् न पुनरुक्तिदोषः । अत्रापि पूर्ववद् व्यतिरेक-रूपकयोः संसृष्टिः ॥ २ ॥ जिनकी कथा रसों (मधुर स्वादों, शृंगारादि रसों) द्वारा अमृत का भी तिर- स्कार करती है-ऐसे भूपाल नल अद्भुत गुणशाली, उज्ज्वल प्रताप को सुवर्ण दण्ड तथा कीर्तिमण्डल को श्वेत छत्र बनानेवाले थे ॥ २ ॥ पवित्रमत्रातनुते जगद्युगे स्मृता रसक्षालनयेव यत्कथा । कथं न सा मद्भिरमाविलामपि स्वसेविनीमेव पवित्रयिष्यति ॥ ३ ॥ सम्प्रति कविः स्वविनयमाविष्करोति-पवित्रमिति । अत्र युगे कलौ इति यावत् । [यत्कथा] यस्य नलस्य, कथा, स्मृता=स्मृतिपथं नीतेत्यर्थः । सती, जगत्= लोकं रसक्षालनयेव=जलक्षालनयेवेत्युत्प्रेक्षा । 'देहधात्वम्बुपारदाः' इति रसपर्याये विश्वः । पवित्रं=विशुद्धम्, आतनुते = करोति, सा=कथा, आाविलां=कलुषामपि, सदोषामपीति यावत् । स्वसेविनीमेव=केवलं स्वकीर्त्तनपरामेवेति भावः । मद्भिरं=
सर्गः १ ] ३ मम वाचं, कथं न पवित्रयिष्यति=अपि तु पवित्रां करिष्यत्येवेत्यर्थः । तथा चोक्तं- 'कर्कोटस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च । ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम्' इति । या स्मृतिमात्रेण शोधनी सा कीर्तनात् किमुतेति कैमुत्यन्यायेनार्थान्तरापत्त्या अर्थाप- त्तिरलंकारः । तदुक्तम्-एकस्य वस्तुनो भावाद् यत्र वस्त्वन्यथा भवेत् । कैमुत्यन्यायतः सा स्यादर्थापत्तिरलङ्क्रिया' इति ॥ ३ ॥ जिनकी कथा का स्मरण इस कलियुग में जल से धुले हुए की भांति विश्व को पवित्र करनेवाली है । फिर भला, वह कथा मेरी वाणी को क्यों न पवित्र करेगी- जो कलुष (साहित्यिक दोषों) से पूर्ण होने पर भी उसकी आराधना में अनुरक्त है ॥ अधीतिबोधाचरणप्रचारणैर्दशाश्चतस्रः प्रणयन्नुपाधिभिः । चतुर्दशत्वं कृतवान् कुतः स्वयं न वेद्मि विद्यासु चतुर्दशत्वयम् ॥ ४ ॥ अस्य सर्वविद्यापारदर्शित्वमाह-अधीतीति । अयं = नलः, चतुर्दशसु विद्यासु=वेदवेदाङ्गादिषु । 'अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः । धर्मशास्त्रं पुराणंश्च विद्या ह्येताश्चतुर्दश' इत्युक्तासु । [अधीतिबोधाचरणप्रचारणैः] अधी- तिरध्ययनं, गुरुमुखात् श्रवणमित्यर्थः । बोधः अर्थावगतिः, आचरणं तदर्थानुष्ठानं, प्रचारणम् अध्यापनं शिष्येभ्यः प्रतिपादनमित्यर्थः । तैश्चतुर्भिः उपाधिभिः=विशेषणैः, आचरणविशेषैरित्यर्थः । 'उपाधिर्धर्मचिन्तायां कैतवे च विशेषणे' इति विश्वः । चतस्रो दशाः = अवस्थाः, प्रणयन् = कुर्वन्नित्यर्थः । स्वयं चतस्रो दशा यासां तासां भावः चतुर्दशत्वं । 'त्वतलोर्गुणवचनस्येति पुंवद्भावो वक्तव्यः' इति स्त्रियाः पुंवद्भावः । संज्ञाजातिव्यतिरिक्ताश्च गुणवचना इति सम्प्रदायः । चतुर्दश- संख्याकत्वं, कुतः=कस्मात्, कृतवान्, न वेद्मि=न जाने इति, स्वतःसिद्धस्य स्वयं करणं कथं पिष्टपेषणवदिति चतुर्दशानां चतुरावृत्तौ षट्पञ्चाशत्त्वात् कथं चतुर्दशत्वमिति च विरोधाभासद्वयम् । चतुरवस्थत्वमिति तत्परिहारश्च । तदुक्तम्- 'आभासत्वे विरोधस्य विरोधाभास उच्यते' इति ॥ ४ ॥ नल ने चौदह विद्याओं (४ वेद, ६ वेदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण) की-अध्ययन, अर्थज्ञान, आचरण और शिक्षाप्रचाररूपी चार उपाधियों से, चार अवस्थाएँ बनाकर भी उनका चतुर्दशत्व कैसे बने रहने दिया ? (वे १४ X ४ = ५६ क्यों न हुई ?)-यह मुझे नहीं मालूम ॥ ४ ॥ अमुष्य विद्या रसनाग्रनर्तकी त्रयीव नीताऽङ्कगुणेन विस्तरम् ।
४ नैषधचरितम् । [ प्रथमः Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri
अगाहताष्टादशतां जिगीषया नवद्वयद्वीपपृथग्जयश्रियाम् ॥ ५ ॥ अथास्यापरा अपि चतस्रो विद्याः सन्तीत्याह-अमुष्येति । अमुष्य = नलस्य रसनाग्रनर्त्तकी = जिह्वाग्रसञ्चारिणीत्यर्थः । विद्या = पूर्वोक्ता सूदविद्या चेति गम्यते रसनाग्रनर्त्तित्वधर्मादिति भावः । त्रयीव = त्रिवेद इव 'इति वेदास्त्रयस्त्रयी' इत्यमरः । [ अङ्गगुणेन ] अङ्गानां 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दसां चितिः । ज्योतिष- ञ्चेति विज्ञेयं षडङ्गं बुधसत्तमैः' इत्युक्तानां । षण्णां मधुराम्ल-कषाय-लवण-कटु- तिक्तानाञ्च रसानां षण्णां गुणेन आवृत्त्या वैशिष्ट्येन च । अथ च अङ्गगुणेन=शरीर- सामर्थ्येन, स्वकीयव्युत्पत्तिविशेषेणेति यावत् । विस्तरं = वृद्धिं, नीता = प्रापिता सती, [नवद्वयद्वीपपृथग्जयश्रियाम्] नवानां द्वयं नवद्वयं लक्षणया अष्टादशेत्यर्थः । तेषां द्वीपानां पृथग्भूता जयश्रियः, तासां जिगीषया व्यञ्जकाप्रयोगाद् गम्योत्प्रेक्षा । जेतुमिच्छयेवेत्यर्थः । अष्टादशताम् अगाहत = अभजत । पूर्वोक्तासु चतुर्दशसु विद्यासु विशिष्टव्युत्पत्त्या आयुर्वेदादीनामनुशीलनसौकर्यात् तत्पारदर्शित्वेन, सूदविद्या- पक्षे च षण्णां रसानाम् उल्बणानुलब्णसमतारूपत्रैविध्येन त्रयीपक्षे च एकैकवेदस्य प्रत्येकशः अङ्गानां शिक्षादीनां षाड्विध्यवैशिष्ट्येन चाष्टादशत्वसिद्धिः । प्रागुक्ता- श्चतुर्दश विद्याः । 'आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चेति ते त्रयः । अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादश स्मृताः' इति । अङ्गविद्यागुणेन त्रय्या अष्टादशत्वमित्युपाध्याय- विश्वेश्वरभट्टारकव्याख्याने तु 'अङ्गानि वेदाश्चत्वारः' इत्याथर्वणस्य पृथग्वेदत्वे त्रयीत्व- हानिः । त्रय्यन्तर्भावे तु नाष्टादशत्वसिद्धिरिति चिन्त्यम् । उपमोत्प्रेक्षयोः संसृष्टिः ॥५॥ पर, जिस तरह त्रयीविद्या ( तीनों वेद ) षडङ्गों से गुणित होने पर १८ संख्यान्वित हो जाती है—उस तरह नल के जिह्वाग्र पर नर्तन करनेवाली विद्या ( सरस्वती )—मानों १८ द्वीपों की पृथक् पृथक् ( नल की ) विजयसूचक लक्ष्मी को ( सपत्नी भाव से ) जीतने की कामना से ही--१८ गुनी हो गयी ॥ ५ ॥ दिगीशवृन्दांशविभूतिरीशिता दिशां स कामप्रसभावरोधिनीम् । बभार शास्त्राणि दृशं द्वयाधिकां निजत्रिनेत्रावतरत्वबोधिकाम् ॥ ६ ॥ अथास्य देवांशत्वमाह--दिगीशेति । [दिगीशवृन्दांशविभूतिः] दिशामीशाः दिगीशाः, दिक्पालो इन्द्रादयः, तेषां वृन्दं समूहः, तस्य मात्राभिः अंशैः, विभूति- रुद्भवः यस्य तथाभूतः । तथाच—'इन्द्रानिल-यमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । चन्द्र- वित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः' इति । 'अष्टाभिर्लोकपालानां मात्राभिर्निर्मितो