भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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[ ४ ] प्रसिद्ध है कि श्रीहर्ष ने अपने ग्रन्थ को उस समय के परम-विख्यात आलोचक दन्तकथा श्रीमम्मट के सम्मुख रखकर, उनकी सम्मति के लिए वाञ्छा प्रकट की। आचार्य मम्मट ने पुस्तक को सावधानी के साथ पढ़ने के लिए रख लिया और अपनी सम्मति प्रदान करने के लिए दूसरे दिन बुलाया। जब ये दूसरे दिन पहुँचे तब उन्होंने इन शब्दों में मार्मिक चुटकी ली कि 'हे हर्ष ! यदि तुम्हारा काव्य मुझे काव्य-प्रकाश-प्रणयन के पूर्व मिला होता तो सप्तम उल्लास लिखने के लिए, संस्कृत-साहित्याटवी के गहन-ग्रन्थों में से दोषान्वेषण करने का प्रयास न करना पड़ता, और एक इसी में सम्पूर्ण दोषों के दृष्टान्त मुझे मिल गये होते।' इस पर श्रीहर्ष ने कहा कि आप एकाध उदाहरण तो बतलाइए तब उन्होंने नैषध (२, ६२) का यह श्लोक सामने रख दिया-- तव वर्त्मनि वर्ततां शिवं पुनरस्तु त्वरितं समागमः । अयि साधय साधयेप्सितं स्मरणीयाः समये वयं वयः ॥ अर्थात् तुम्हारा यह श्लोक मङ्गल के स्थान पर अमङ्गल का सूचक है। पदच्छेद में किञ्चित् विभिन्नता कर के इसे पढ़ो और देखो कि वस्तुतः बात ठीक है या नहीं ? तव वर्त्म निवर्ततां शिवं, पुनरस्तु त्वरितं स माऽऽगमः । अयि साध्यसाधयेप्सितं स्मरणीयाः समये वयं वयः ॥ अर्थः-तुम्हारा कल्याणदायक मार्ग बदल जाय। तुम फिर कभी लौटो ही नहीं। हे आधिसहित ! मेरे अभीष्ट को मत पूरा करो। हे पक्षी ! हमारे परलोक वासी होने के बाद समय-समय पर हमारा स्मरण कर लिया करना। इस प्रकार अपने मामा की व्यङ्ग्यपूर्ण सम्मति सुन कर, श्रीहर्ष खिन्नचित्त हो चुपचाप लौट आये। यह घटना सत्य है, किं वा असत्य-इस सम्बन्ध में भी विभिन्न मत हैं। अस्तु, मैंने प्रचलित जनश्रुति का उल्लेख कर दिया। श्रीहर्ष ने नैषध के अन्त में लिखा है कि- कालनिर्णय ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरात् । इस से स्पष्ट है कि कान्यकुब्जेश्वर इनकी बड़ी प्रतिष्ठा करते थे। अब यह प्रश्न उठता है कि इनके आश्रयदाता कान्यकुब्जेश्वर का क्या नाम था ? तो उपर्युक्त प्रसङ्ग से आप को स्पष्ट हो गया होगा कि गहर-वार-राजपूत-कुल-भूषण