भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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[ ३ ] अपनी रचनाओं के अन्त में उन्होंने अपने आश्रयदाता की ओर मूक सङ्केत किया है। इसके अतिरिक्त राजशेखर सूरि ने सन् १३४८ ई० में रचित अपने 'प्रबन्धकोष' में श्रीहर्ष का संक्षिप्त जीवनचरित दिया है। अतः प्राप्त-सामग्री के आधार पर उनका जीवन चरित लिखने का प्रयास किया जा रहा है। श्रीहर्ष के पिता का नाम श्रीहीर तथा माता का नाम श्री मामल्ल देवी था। श्रीहीर वस्तुतः कवि-राज-राजि-मुकुटालङ्कार के हीरक मणि थे। वे काशी के गहरवार- नरेश श्रीविजयचन्द्र के सभापण्डित थे। एक बार वे सभा में मिथिला के प्रसिद्ध नैयायिक श्रीउदयनाचार्य से शास्त्रार्थ में हार गये। इससे उन्हें अत्यन्त मार्मिक पीडा हुई। वे सुरलोक की यात्रा करते समय अपने पुत्र से कह गये कि हे बेटा ! मुझे अपनी पराजय का अतीव क्लेश है। मैं परलोक में भी शान्ति एवं सद्गति न प्राप्त कर सकूँगा। अतः मैं तुम्हें उसी दिन अपना सुपुत्र मानूंगा—जिस दिन तुम अपने पिता के विजेता पण्डित को शास्त्रार्थ में पराजित कर, अपने पिता के अप- मान का बदला लोगे। इस परीक्षा-पाथोधि में सफल मनोरथ होने के लिए श्रीहर्ष ने भगवती जाह्नवी के तट पर बैठ कर, साल भर तक चिन्तामणि मन्त्र का जाप किया। जिससे प्रसन्न होकर भगवती त्रिपुरा ने उन्हें साक्षात् दर्शन देकर, पाण्डित्य के अगाध सागर होने का अमोघ वरदान दिया। उन्हें असाधारण कवित्व शक्ति प्रस्फुरित हुई और वे तत्काल विजयचन्द्रदेव की राजसभा में गये। जाते ही उन्होंने राजा का इन श्लेषात्मक वाक्यों द्वारा अभिनन्दन किया— गोविन्दनन्दनतया च वपुःश्रिया च माऽस्मिन् नृपे कुरुत कामधियं तरुण्यः। अस्त्रीकरोति जगतां विजये स्मरः स्त्री-स्त्री जनः पुनरनेन विधीयते स्त्री ॥ इसे सुनकर समस्त सभासदों के साथ महाराज बड़े प्रसन्न हुए। उनके अगाध पाण्डित्य को देखकर, उनके पिता के विजेता ने भी सर्वतोभावेन अपनी पराजय स्वीकार कर ली। इस प्रकार पिता की अन्तिम आज्ञा का पालन कर, वे पितृ-ऋण से उन्मुक्त हो, उन्होंने पिता का वाङ्मय तर्पण किया। तत्पश्चात् वे जयचन्द्र की सभा में स-सम्मान निवास करने लगे। उन्होंने राजा के अत्यन्त आग्रह करने पर नैषधचरित की रचना की। श्रीहर्ष के सम्बन्ध में एक किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि ये काव्य-प्रकाश-रचयिता श्रीमम्मटाचार्य के भागिनेय थे। वे अत्यन्त वृद्ध हो गये थे। जब इनका नैषध-