नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहर्ष बना दिया । श्रीहर्ष काव्य-कला के कुशल कुलपति हैं; मानव-हृदय की सूक्ष्म अनुभूतियों के सच्चे पारखी हैं; चरित्र-चित्रण करने के अद्भुत चित्रकार हैं। इनकी तूलिका इतनी मँजी-मँजायी है कि कहीं भी अस्वाभाविक वर्ण को स्थान नहीं। भगवती त्रिपुरा से प्राप्त अपने अगाध पाण्डित्य को श्रीहर्ष ने कविता- कामिनी के कोमल कर-कमलों में अर्पित कर दिया । श्रीहर्ष की कविता-कामिनी रुचिर वर्ण तथा पद से युक्त है; रस-भाव से परिपूर्ण है; कृत्रिमता से कोसों दूर है; और तरुणी नायिका की भाँति अखिल तरुणवृन्द के हृदय को हठात् अपनी ओर आकर्षित करती है । श्रीहर्ष की रस- भाव-मयी कविता के अधर का आस्वादन कर, सहृदय भावुकजनों के हृत्पयोधि में हर्ष की लहरी अठखेलियाँ करने लगती हैं। जिस प्रकार अनङ्ग अङ्गना के द्वारा अखिल विश्व को मोहित करता है, उसी प्रकार श्रीहर्ष की कविता की शब्द-शय्या अपने सौष्ठव, सौन्दर्य, सौकुमार्य द्वारा काव्य-कानन-विहरण-शील पुरुषों के मन को उद्वेलित करती है। उनकी कविता में एक आश्चर्यजनक अनूठापन है। थोड़ा पढ़ लेने पर, अधिक जाननेकी, आगे बढ़ने की, एक मधुर वेदना हृदय में उठती है । उन्हीं महाकवि का नैषध काव्य सन्तप्त-हृदय काव्यपिपासुओं के लिए सुधा की निर्झरिणी है, भारतीय चातकों के लिए स्वाती की बूँद है, राष्ट्र के लिए गर्व की वस्तु है और विश्व को अनुपम देन है । यद्यपि यह कहा गया है कि— 'उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् । दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः ॥' तथापि विद्वद्वर्ग उच्च स्वर से पाञ्चजन्य घोष करता है कि— 'उदिते नैषधे काव्ये क्व माघः ? क्व च भारविः ?' इसकी पुष्टि निम्नाङ्कित उक्ति से भी होती है कि— 'नैषधं विद्वदौषधम् ।' आइये, ऐसे विद्वत्कुलचक्रचूडामणि के सम्बन्ध में परिचय प्राप्त कीजिए । यह बात तो लोक-प्रसिद्ध है कि संस्कृत-साहित्य के महाकवियों ने अपने सम्बन्ध में या तो लिखा ही नहीं है, या इतना स्वल्प लिखा है कि उनके जीवन की कुछ महान् घटनाएं अस्पष्ट सी रह जाती हैं। जीवनवृत्त हर्ष की बात यह है कि श्रीहर्ष ने अपने महाकाव्य के प्रति सर्ग के अन्तिम श्लोक में अपने माता-पिता का नाम,