नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ वन्दे मातरम् ॐ भूमिका संस्कृत-साहित्य-क्षितिज में तीन बृहन्नक्षत्र अपनी कमनीय कान्ति बिखेर रहे हैं। ‘नैषध, किरातार्जुनीय तथा शिशुपालवध’ नामक बृहत्त्रयी का अखिल विद्वद्वर्ग में अतीव आदर है। संस्कृत-साहित्याटवी में अगणित महाकाव्य-मृगाधिपों के होते हुए भी हमारा भारतीय समाज इसी बृहत्त्रयी के अध्ययन में अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग करता है। संस्कृत महाकाव्य में व्युत्पत्ति पैदा करने के समुद्देश्य से बृहत्त्रयी का मनन करना नितान्त आवश्यक है। इसके अशेषतः अध्ययन से, न केवल शब्दकोष में ही वृद्धि होती है, प्रत्युत नवीन रस भाव भङ्गी का परिज्ञान अत्युच्च कोटि का हो जाता है। परन्तु इधर कुछ दिनों से खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस प्रणाली में विश्रृंखला उत्पन्न हो गयी है। जिनकी धवल कीर्ति-कौमुदी से आज दिन भी धरा-धाम प्रकाशमान हो रही है उन कविता-कामिनी-कान्त श्रीहर्ष के नाम से ऐसा कौन सुर-भारती-सेवी है जो परिचित न हो, अथवा जिसके कर्ण-कुहर में यह नाम न गया हो? श्रीहर्ष को महा- कवि जयदेव अपने प्रसन्नराघव नाटक की प्रस्तावना में कविता-कामिनी का हर्ष कहते हैं। महाकवि के शब्दों में— यस्याश्चौरश्चिकुरनिकुरः, कर्णपूरो ‘मयूरः’ ‘भासो’ हासः, कविकुलगुरुः ‘कालिदासो’ विलासः । ‘हर्षो’ हर्षो हृदयवसतिः पञ्चबाणस्तु ‘बाणः’ केषां नैषा कथय कविता-कामिनी-कौतुकाय ॥ किस सहृदय के हृदय को श्रीहर्ष की कविता-कामिनी की कमनीय कान्ति नहीं लुभाती ? अलङ्कारों की रमणीयता, भाषा का लावण्य, भाव का सौष्ठव, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, पदों की कोमल कान्त अवली, श्लेषों की अक्लिष्टता, प्रसादादि गुणों की गरिमा—इन सब ने मिल कर, श्रीहर्ष को कविता-कामिनी का वस्तुतः