नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५ ] विजयचन्द्र तथा जयचन्द्र के ये सभापण्डित थे । इस प्रकार इनका अविर्भाव-काल द्वादश शताब्दी का उत्तरार्द्ध ठहरता है । ये सकल शास्त्रनिष्णात, अतीव मेधावी, वादविवाद में अकुण्ठित बुद्धि सम्पन्न, ओजस्विनी वक्तृतादाता एवं अप्रतिभट पण्डित थे । यह बात पिता के पराजित करनेवाले का इनके द्वारा पराजित हो जाना, स्पष्ट करती श्रीहर्ष की योग्यता है । इनकी रचनाओं का आदर उद्भट कवि-कुल-निवास- स्थल काश्मीर में हुआ था । यथा — काश्मीरैर्महिते चतुर्दशतयीं विद्यां विदद्भिः महा०’ ( १६, १३० ) इस सम्बन्ध में भी एक जनश्रुति है कि ये किस प्रकार काश्मीर गये, किस प्रकार रचना-परीक्षा हुई, किस प्रकार काश्मीर नरेश की सभा में पहुँचे और किस प्रकार उन्हें पारितोषिक प्राप्त हुआ, आदि । परन्तु स्थानाभाव के कारण इसका उल्लेख नहीं करूंगा । ये न केवल काव्यमर्मज्ञ थे, प्रत्युत महायोगी थे और समाधि- अवस्था में परम ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे । यथा— यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परं ब्रह्म प्रमोदार्णवम् । सत्रहवें सर्ग में कलि के मुख से समस्त आस्तिक मतों का खण्डन कराना तथा इन्द्र यम अग्नि वरुण द्वारा उनका निराकरण करना — इनके विलक्षण पाण्डित्य का द्योतक है । इन्होंने कलि के मुख से पाणिनि के एक सूत्र की विचित्र व्याख्या करा डाली है । इनकी कल्पना एकदम निराली है । देखिए— उभयी प्रकृतिः कामे सजेदिति मुनेर्मनः । अपवर्गे तृतीयेति भणतः पाणिनेरपि ॥ (नैषध, १७,७०) स्त्री तथा पुरुष प्रकृति दोनों काम (-उपभोग ) में ही आसक्त रहा करें । जो स्त्री-पुरुष के लक्षणों से युक्त हैं तथा मैथुन में समर्थ हैं वे ही कामोपभोग के अधि- कारी हैं । अपवर्ग (मोक्ष) तो केवल तृतीया प्रकृति-नपुंसकों-के लिए ही है । जो नपुंसक हैं, मैथुन कर्म में अशक्त हैं वे ही तीर्थयात्रा आदि करके मोक्ष का साधन करें । 'अपवर्गे तृतीया' सूत्र बनाकर पाणिनि ने भी इस बात को स्वीकार किया है । ये कामशास्त्र के कितने गहन विद्वान् थे— यह नैषध के अन्तिम पाँच सर्गों के पढ़ने से स्पष्ट होता है ।