नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६ ] श्रीहर्ष ने कई ग्रन्थरूपी पुष्प-स्तबकों द्वारा सुर-भारती की आराधना की है। सम्पूर्ण शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन करके, तत्तद्विषयों का प्रतिपादन जितना सुन्दर ढंग से इन्होंने किया है, उस भाँति किसी अन्य ने नहीं किया ग्रन्थ— है। इनके बनाये हुए ग्रन्थों की तालिका नैषधीय चरित में ही दी गयी है। यथा— १ स्थैर्यविचारप्रकरण (नैषध ४, १२३) २ विजय-प्रशस्ति (५, १३८) ३ खण्डनखण्डखाद्य (६, ११३) इसमें अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इसकी टक्कर का कोई दूसरा ग्रन्थ अखिल वेदान्त-जगत् में नहीं है। यह वेदान्तशास्त्र का अनुपम हीरक मणि है और श्रीहर्ष की अलौकिक दार्शनिक पटुता का उच्च स्वर से डिण्डिम घोष कर रहा है। इस उच्चकोटि के ग्रन्थ के अध्ययन- अध्यापन से विलक्षण प्रतिभा उत्पन्न होती है। काव्य-जगत् में जो स्थान नैषध का है, वही स्थान दर्शन-ग्रन्थों में खण्डनखण्डखाद्य को प्राप्त है। इसका मङ्गला- चरण बड़ा भव्य है— अविकल्पविषय एकः, स्थाणुः पुरुषः श्रुतोऽस्ति यः श्रुतिषु । ईश्वरमुमया न परं, वन्देऽनुमयाऽपि तमधिगतम् ॥ ४ गौडोर्वीश-कुल-प्रशस्ति (७, ११०) ५ अर्णववर्णन (६, १६०) ६ छिन्द प्रशस्ति (१७, २२२) ७ शिवशक्तिसिद्धि (१८, १४८) ८ नवसाहसाङ्क चरित चम्पू (२२, १५१) ९ नैषधीय चरित—इसमें निषध-नरेश महाराज नल का चरित्र अत्यन्त अलौकिक रीति से वर्णन किया गया है इसके प्रत्येक सर्ग में प्रायः १०० से अधिक श्लोक हैं। इस महाकाव्य में २२ सर्ग हैं। कुछ विद्वानों का कथन है कि नैषध में और भी सर्ग रहे होंगे—जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं। इसमें प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन प्राचुर्य के साथ किया गया है। उसमें अनुपम वैचित्र्य है। इसके पढ़ने से स्पष्ट प्रतिभासित होता है कि महाकाव्य के अशेष लक्षणों को सन्निविष्ट कर, उनको चरितार्थ करने ही के दृष्टिकोण से महाकवि अपनी रचना में प्रवृत्त हुआ है। महाकाव्यों का प्राकृतिक वर्णन भी एक आवश्यक अङ्ग है। इस नियम के अनुसार कवि ने उसको स्थान दिया है; पर प्रचलित परिपाटी या पुस्तकों के आधार पर प्रकृति-वर्णन नहीं किया है। प्रकृति-प्रमदा के रूप एवं भावों की छुटा का भली- भाँति निरीक्षण कर, अनुभव के द्वारा उसके प्रत्येक अवयव को सजाया है।