भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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[ ६ ] के सम्बन्ध में निःसङ्कोच कहा जा सकता है कि अखिल संस्कृत-साहित्य-संसार में उसके टक्कर की दूसरी नहीं। प्रत्येक श्लोक में शब्दश्लेष किंवा अर्थश्लेष पाया जाता है। हमारे पण्डित-समाज में 'पञ्चनली' ( १३, ३४ ) तो प्रसिद्ध है— जहाँ एक श्लोक से पाँचों नलों का वर्णन किया गया है। क्या विश्व की किसी भी भाषा में यह सम्भव है ? श्रीहर्ष की कविता की शैली उत्कृष्ट वैदर्भी है। वैदर्भी की प्रशंसा में वे स्वयं कहते हैं कि— धन्यासि वैदर्भि ! गुणैरुदारैः ( ३, ११६ ) श्रीहर्ष की कविता नैसर्गिक सरिता के तुल्य है, कृत्रिम नहर की भाँति नहीं, जिसकी धारा का प्रवाह बड़े वेग से बहता चला जा रहा है। इनकी कविता में माधुर्य तथा प्रसाद गुण कूट-कूट कर भरे हुए हैं। सुन्दर अर्थों की कमनी- यता अतीव मुग्धकारिणी है। इनका काव्य मौलिक अर्थों की खान है; उसमें अर्थों का पिष्टपेषण नहीं; सर्वत्र नवीन अर्थों का समावेश है। स्थानाभाव के कारण उनकी कविताओं की बानगी और सूक्तियाँ नहीं दी जा रही हैं। आशा है, हमारे पाठक महोदय क्षमा करेंगे। म० म० मल्लिनाथ की 'जीवातु' टीका के साथ यह संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। मूल में आये हुए शब्दों को स्थूलाक्षरों में और टीका में आये हुए पर्यायवाची शब्दों को सूक्ष्माक्षरों में दिया गया है-जिस से प्रस्तुत संस्करण अन्वय स्पष्ट हो जाता है। इस अभिनव शैली से छात्रों का बड़ा उपकार होगा। छात्रों को मूल श्लोक लग जाय-इस अभिप्राय से मैंने श्लोकों का शब्दार्थ देते हुए, उन्हीं के दृष्टिकोण से हिन्दी में अनुवाद किया है। मैं अपने प्रयास में कहाँ तक सफल हुआ--इसकी परख विद्यार्थी गण अपनी निकष-ग्रावा पर करें। साथ ही जो इसमें त्रुटि रह गयी हो, उसके लिए बारम्बार क्षमा प्रार्थी हूँ। अन्त में उत्तर प्रदेशीय सरकार के सूचना तथा सिंचाई सचिव पण्डितवर श्री कमलापति त्रिपाठी जी को धन्यवाद देना अपना परम सौभाग्य समझता हूँ, जिन्होंने मेरी भेंट स्वीकार कर, अपने वंशक्रमानुगत सौजन्य का परिचय दिया है। काशी दीपावली सं० २००९ } मन्नालाल अभिमन्यु