भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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[ ८ ] दमयन्ती के केशकलाप से लेकर चरण पर्यन्त सर्वाङ्ग वर्णन २, २० से लेकर २, ६६ तक पढ़िए। शृङ्गार रस की सरसता देखते ही बनती है। पढ़नेवाला उस रस में आचूड सराबोर हो जाता है। सम्भोग शृङ्गार तथा विप्रलम्भ शृङ्गार कवियों के मनोरञ्जक विषय हैं। विप्रलम्भ के करुणमय वर्णन के बिना वे अपने को कृतकार्य नहीं समझते। श्रीहर्ष के काव्य में सम्भोग का प्रकाशमान रूप हमारे हृदय में हर्ष-कहार उत्पन्न करता है और विप्रलम्भ की करुणमूर्ति हमारे अन्तःकरण में उसी प्रकार करुणा उत्पन्न करती है, जिस प्रकार पराधीन भारत में पिकेटिङ्ग करती हुई महिलाओं के प्रति शासन-शकट का दुर्व्यवहार। श्रीहर्ष ने नल-दमयन्ती के सम्भोग वर्णन करने में पाठकों को सम्भोग की चासनी चखायी है। हंस को दूत बनाकर भेजने में नल ने उससे जो विरह-वेदना व्यक्त की है, उससे विप्रलम्भ की छटा देखते ही बनती है। हंस का विलाप (१, १३५ से १, १४२ तक) करुणरस का सर्वोत्तम निदर्शन है। हमारे कवि को इसमें पूर्णतया सफलता मिली है। हंस कितने मार्मिक शब्दों में कहता है— मदेकपुत्रा जननी जरातुरा नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी। गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयन्नहो विधे ! त्वां करुणा रुणद्धि नो ॥ आप इसे ज्यों ज्यों पढ़ते जाइए त्यों त्यों हृदय पर इतना प्रभाव पड़ता है कि अन्त में आँखों को भी दो बूँद आँसू गिराना पड़ता है। धन्य है, कवि की वर्णनात्मक शैली को। कविता-शैली अपने ढंग की अनुपम है। वह कृत्रिम नहीं, प्रत्युत अलङ्कृत है। प्रत्येक वर्णन, प्रत्येक भाव साधारण शब्दों में (उवाच, अपश्यत्) न हो कर अलङ्कृत भाषा ( 'अमोचि चञ्चुपुटमौनमुद्रा'-३, ६६; 'अक्षिलक्षीचकार,— २, १०७) में है। अलङ्कारों के चयन में भी श्रीहर्ष ने कमाल किया है। उपमा के जो प्रधान गुण विषय को मर्मस्पर्शी एवं विशद बनाना, काव्य-सौन्दर्य को बढ़ाना आदि है— वे गुण श्रीहर्ष की रचना में पाये जाते हैं, उनका पूर्ण विकास उनकी अतुलनीय उपमाओं में हुआ है। उपमाओं की लड़ी टूटती नहीं, उनकी उपमाएं एक से एक बढ़ कर अद्वितीय कल्पनामयी हैं। उनकी उपमा की अनुरूपता तथा नवीनता