संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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आट्' न होनेसे 'ध्वनयीत्' रूप हुआ है (लोकमें घटादि ध्वन धातुका रूप 'अदिध्वनत्' होता है और चुरादिका रूप 'अदध्वनत्' होता है)। 'ध्वनयीत्' इत्यादि प्रमुख उदाहरण हैं। 'निष्टर्क्य०' इत्यादि प्रयोग वेदमें निपातनसे सिद्ध होते हैं। 'छन्दसि निष्टर्क्य' इत्यादि सूत्र इसमें प्रमाण हैं। यहाँ 'निस्पूर्वक कृत्' धातुसे 'ऋदुपधाच्च' सूत्रके अनुसार 'क्यप्' प्राप्त था; परंतु 'ण्यत्' प्रत्यय हुआ है; साथ ही 'कृत' में आदि-अन्तका विपर्यय होनेसे 'तृक' रूप बना। फिर गुण होनेसे तर्क्स हुआ। 'निस्'के 'स्' का षत्व हुआ और ष्टुत्व होकर 'निष्टर्क्य' सिद्ध हुआ। 'गृभाय' इत्यादि प्रयोग वैकल्पिक 'शायच्' होनेसे बनते हैं। हृ-धातुसे शायच् हुआ और 'हृग्रहोर्भश्छन्दसि' के आदेशानुसार 'ह' के स्थानमें 'भ' हो गया तो 'गृभाय' बना—'गृभाय जिह्वया मधु' ॥ ७ ॥ शास्त्रकार सुप्, तिङ्, उपग्रह (परस्मैपद-आत्मनेपद), लिङ्ग, पुरुष, काल, हल्, अच्, स्वर, कर्तृ, (कारक) और यङ्—इन सबका व्यत्यय (विपर्यय) चाहते हैं, वह भी बाहुलकसे सिद्ध होता है ॥८॥ 'रात्री' शब्दमें 'रात्रेश्चाजसौ' (पा० सू० ४। १। ३१) इस नियमके अनुसार रात्रि-शब्दसे ङीप्-प्रत्यय हुआ है। (लोकमें 'कृदिकारादक्तिनः 'से ङीष् होकर अन्तोदात्त होता है।) 'विभ्वी' में भी विभु-शब्दसे 'भुवश्च' के नियमानुसार ङीष् हुआ है। 'कद्रूः' पदमें 'कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि' से ऊङ्-प्रत्यय हुआ है। 'आविष्ट्यो वर्धते' इत्यादि स्थलोंमें 'अविष्ट्यस्योपसंख्यानं छन्दसि' के नियमानुसार 'आविस्' अव्यय से 'त्यप्' यह तद्धित-प्रत्यय हुआ है। 'वाजसनेयिनः' में 'वाजसनेयेन प्रोक्तमधीयते' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वाजसनेय-शब्दसे 'शौनकादिभ्यश्छन्दसि' सूत्रके द्वारा 'णिनि' प्रत्यय हुआ है ॥ ९ ॥ 'कर्णेभिः' में 'बहुलं छन्दसि' के नियमानुसार 'भिस्' के स्थानमें 'ऐस्' आदेश नहीं हुआ है। 'यशोभगयः' पदमें 'वेशोयश आदेर्भागाद् यल्' इस सूत्रसे 'यल्' प्रत्यय हुआ है। इत्यादि उदाहरण जानने चाहिये। 'चतुरक्षरम्' पदसे चार अक्षरवाले 'आश्रावय' 'अस्तु श्रौषट्' आदि पदोंकी ओर संकेत किया गया है। अक्षर-समूह वाच्य हो तो 'छन्दस्' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय होता है—'छन्दस्यः' यह उदाहरण है। 'देवासः' में 'आज्जसेरसुकू' इस नियमके अनुसार 'असुक्' का आगम हुआ है। 'सर्वदेव' शब्दसे स्वार्थमें 'तातिल्' प्रत्यय होता है। 'सविता नः सुवतु सर्वदेवतातिम्' इस उदाहरणमें 'सर्वदेव' शब्दसे 'तातिल्' प्रत्यय होनेपर 'सर्वदेवताति' शब्दकी सिद्धि होती है। 'युष्मद्', 'अस्मद्' शब्दोंसे सादृश्य-अर्थमें 'वतुप्' प्रत्यय होता है। इस नियमसे 'त्वावतः' पदकी सिद्धि हुई है। 'त्वावतः' का पर्याय है 'त्वत्सदृशान्' (तुम्हारे सदृश) ॥ १० ॥ 'उभयाविनम्' इत्यादि पदोंमें 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे मत्वर्थमें विनि प्रत्यय हुआ है। 'छन्दोविन्प्रकरणे०' इत्यादि नियमसे उभय शब्दके अकारका दीर्घ होनेसे 'उभयाविनम्' रूप बना है। प्रत्न, पूर्व आदि शब्दोंसे इवार्थमें 'थाल्' प्रत्यय होता है, इस नियमसे 'प्रत्नथा' बनता है। इसी प्रकार 'पूर्वथा' आदि भी हैं। वेदमें 'ऋच्' शब्द परे होनेपर त्रिका सम्प्रसारण होता है और उत्तरपदके आदिका लोप हो जाता है। 'तिस्र ऋचो यस्मिन्' तत् तृचं सूक्तम्। जिसमें तीन ऋचाएँ हों, उस सूक्तका नाम 'तृच्', है। 'त्रि+ऋच्' इस अवस्थामें 'त्रि'का सम्प्रसारण होनेपर 'तृ' बना और ऋच्के ऋका लोप हो गया तो 'तृचम्' सिद्ध हो गया। 'इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथाम्' यहाँ 'अप' उपसर्गके साथ 'स्पृध' धातुके लङ् लकारमें प्रथम पुरुषके द्विवचनका रूप है। 'अपस्पृधेथाम्' यह निपातनसे सिद्ध होता है। रेफका सम्प्रसारण और अलोप निपातनसे ही होता है। माङ्का योग न होनेपर भी अडागमका अभाव हुआ है (लोकमें इसका रूप 'अपास्पर्धेथाम्' होता है)। 'वसुभिर्नो अव्यात्' इत्यादिमें