संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 259 of 770
Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २५७
'अव्यादवद्या०' इत्यादि सूत्रके अनुसार व्यपर 'अ' परे होनेपर एङ् (ओ)-का प्रकृतिभाव हुआ है। 'आपो अस्मान् मातरः' इत्यादि प्रयोग भी 'आपो जुषाणो०' आदि नियमके अनुसार प्रकृति-भावसे सिद्ध होते हैं। आकार परे रहनेपर 'आपो' आदिमें प्रकृतिभाव होता है॥ ११॥ 'समानो गर्भः सगर्भस्तत्र भवः सगर्भ्यः।' यहाँ 'समानस्य सः' इत्यादि सूत्रसे समानका 'स' आदेश हुआ है। 'सगर्भसयूथसनुताद् यत्' से यत्-प्रत्यय हुआ है। 'अष्टापदी' यहाँ 'छन्दसि च'-के नियमानुसार उत्तरपद परे रहते अष्टन्के 'न'का 'आ' आदेश हो गया है। 'ऋतौ भवम् ऋत्त्व्यम्'—जो ऋतुमें हो, उसे 'ऋत्त्व्य' कहते हैं। 'ऋत्त्व्यास्त्व्यः' इत्यादि सूत्रसे निपातन करनेपर 'ऋत्त्व्यम्' पदकी सिद्धि होती है। अतिशयेन 'ऋजु' इति 'रजिष्ठम्'—जो अत्यन्त ऋजु (कोमल या सरल) हो, उसे 'रजिष्ठ' कहा गया है। 'विभाषर्जोश्छन्दसि' के नियमानुसार इष्ठ, इमन् और ईयस् परे रहनेपर ऋजुके 'ऋ'के स्थानमें 'र' होता है। 'ऋजु+इष्ठ' इस अवस्थामें ऋके स्थानमें 'र' तथा उकार लोप होनेसे 'रजिष्ठ' शब्द बना है। 'त्रिपञ्चकम्'—त्रीणि पञ्चकानि यत्र तत् 'त्रिपञ्चकम्' इस विग्रहके अनुसार बहुव्रीहि समास करनेपर 'त्रिपञ्चकम्' की सिद्धि होती है। 'हिरण्ययेन सविता रथेन' इस मन्त्र-वाक्यमें 'ऋत्त्व्यास्त्व्य' आदि सूत्रके अनुसार हिरण्य-शब्दसे 'मयट्' प्रत्यय और उसके 'म'- का लोप निपातन किया जाता है। इससे 'हिरण्यय' शब्दकी सिद्धि होती है। 'इतरम्'—वेदमें इतर शब्दसे 'अड्ड' का निषेध है। अतः 'सु' का 'अम्' आदेश होनेसे 'इतरम्' पद सिद्ध होता है। यथा—'वार्त्रघ्नमिरतम्'। 'परमे व्योमन्' यहाँ 'व्योमनि' रूप प्राप्त था; किंतु 'सुपां सुलुक्' इत्यादि नियमसे ङि-विभक्तिका लुक् हो गया॥ १२॥ 'उर्विया' की जगह 'उरुणा' रूप प्राप्त था। 'टा' का 'इया' आदेश होनेसे 'उर्विया' रूप बना। 'इयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम्' इस वार्तिकसे यहाँ 'इयाज्' हुआ है। 'स्वप्रया'के स्थानमें 'स्वप्रेन' यह रूप प्राप्त था, किंतु 'सुपां सुलुक०' इत्यादि नियमके अनुसार 'टा' का 'अयाच्' हो गया; अतः 'स्वप्रया' रूप बना। 'वारयध्वम्' रूप प्राप्त था, किंतु 'ध्वमो ध्वात्' सूत्रसे 'ध्वम्' के स्थानमें 'ध्वात्' आदेश होनेसे 'वारयध्वात्' हो गया। 'अदुहत' के स्थानमें 'अदुह' यह वैदिक प्रयोग है। 'लोपस्त आत्मनेपदेषु' इस सूत्रसे तलोप और 'बहुलं छन्दसि' से रुटका आगम हुआ है। 'वै' पादपूर्तिके लिये है। 'अवधिषम्' यह रूप प्राप्त था, इसके स्थानमें 'वधीं' रूप हुआ है। यहाँ 'अम्'का 'म्' आदेश और अडागमका अभाव तथा 'ईट्' का आगम हुआ है—वधीं वृत्रम्। 'यजध्वैनं'—यहाँ 'यजध्वम्+एनम्' इस दशामें 'ध्वम्' के 'म्' का लोप होकर वृद्धि होनेसे उक्त रूपकी सिद्धि हुई है। 'तमो भरन्त एमसि'—यहाँ 'इमः'के स्थानमें 'इदन्तो मसि' इस सूत्रके अनुसार 'एमसि' रूप हुआ है। 'स्विन्नः स्नात्वी मलादिव'— इस मन्त्रमें 'स्नात्वा' रूप प्राप्त था; किंतु 'स्नात्यादयश्च'—इस सूत्रके अनुसार उसके स्थानमें 'स्नात्वी' निपातन हुआ। 'गत्वाय'—गत्वाके स्थानमें 'क्त्वो यक्' सूत्रके अनुसार 'यक्'का आगम होनेसे उक्त पद सिद्ध होता है। 'अस्थभिः' में अस्थि-शब्दके 'इ'को 'अनङ्' आदेश होकर नलोप हो गया है। 'छन्दस्यपि दृश्यते' इस नियमसे हलादि विभक्ति परे रहनेपर भी 'अनङ्' आदेश होता है॥ १३॥ 'गोनाम्' यहाँ आम्-विभक्ति परे रहते नुट्का आगम हुआ है। किसी छन्दके पादान्तमें गो-शब्द हो तो प्रायः षष्ठी-बहुवचनमें वहाँ नुट्का आगम हो जाता है। 'अपरिह्वुताः' यहाँ 'हु ह्वरेश्छन्दसि'से प्राप्त हुए ''हु' आदेशका अभाव निपातित हुआ है। 'ततुरिः', 'जगुरिः' इत्यादि पद भी 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे निपातनद्वारा सिद्ध होते हैं। 'ग्रसिताम्' 'ग्रसु' अदनेका निष्ठान्त रूप है। यहाँ