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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 449 of 770

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Page 449
  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४४७

परिपूर्ण सुखस्वरूप हैं, मैं आपके लिये मधुपर्क अर्पण करता हूँ। मुझपर प्रसन्न होइये।

पुनराचमनीय

उच्छिष्टोऽप्यशुचिर्वापि यस्य स्मरणमात्रतः।
शुद्धिमाप्नोति तस्मै ते पुनराचमनीयकम्॥ ५०॥

जिनके स्मरण करनेमात्रसे जूठा या अपवित्र मनुष्य भी शुद्धि प्राप्त कर लेता है, उन्हीं आप परमेश्वरके लिये पुनः आचमनार्थ (जल) उपस्थित करता हूँ।

स्नेह (तैल)

स्नेहं गृहाण स्नेहेन लोकनाथ महाशय।
सर्वलोकेषु शुद्धात्मन् ददामि स्नेहमुत्तमम्॥ ५१॥

जगदीश्वर! आपका अन्तःकरण विशाल है। सम्पूर्ण लोकोंमें आप ही शुद्ध-बुद्ध आत्मा हैं, मैं आपको यह उत्तम स्नेह (तैल) अर्पण करता हूँ, आप इस स्नेहको स्नेहपूर्वक ग्रहण कीजिये।

स्नान

परमानन्दबोधाब्धिनिमग्ननिजमूर्तये ।
साङ्गोपाङ्गमिदं स्नानं कल्पयाम्यहमीश ते॥ ५२॥

ईश! आपका निज स्वरूप तो निरन्तर परमानन्दमय ज्ञानके अगाध महासागरमें निमग्न रहता है, (आपके लिये बाह्य स्नानकी क्या आवश्यकता है?) तथापि मैं आपके लिये यह साङ्गोपाङ्ग स्नानकी व्यवस्था करता हूँ।

अभिषेक

सहस्रं वा शतं वापि यथाशक्त्यादरेण च।
गन्धपुष्पादिकैरीश मनुना चाभिषिञ्चये॥ ५३॥

ईश! मैं आदरपूर्वक यथाशक्ति गन्ध-पुष्प आदिसे तथा मन्त्रद्वारा सहस्र अथवा सौ बार आपका अभिषेक करता हूँ।

वस्त्र

मायाचित्रपटच्छन्ननिजगुह्योरुतेजसे ।
निरावरणविज्ञान वासस्ते कल्पयाम्यहम्॥ ५४॥

निरावृतविज्ञानस्वरूप परमेश्वर! आपने मायारूप विचित्र पटके द्वारा अपने महान् तेजको छिपा रखा है। मैं आपके लिये वस्त्र अर्पण करता हूँ।

उत्तरीय

यमाश्रित्य महामाया जगत्सम्मोहिनी सदा।
तस्मै ते परमेशाय कल्पयाम्युत्तरीयकम्॥ ५५॥

जिनके आश्रित रहकर भगवती महामाया सदा सम्पूर्ण जगत्को मोहित किया करती है, उन्हीं आप परमेश्वरके लिये मैं उत्तरीय अर्पण करता हूँ।

दुर्गा देवी, भगवान् सूर्य तथा गणेशजीके लिये लाल वस्त्र अर्पण करना चाहिये। भगवान् विष्णुको पीत वस्त्र और भगवान् शिवको श्वेत वस्त्र चढ़ाना चाहिये। तेल आदिसे दूषित फटे-पुराने मलिन वस्त्रको त्याग दे।

यज्ञोपवीत

यस्य शक्तित्रयेणेदं सम्प्रीतमखिलं जगत्।
यज्ञसूत्राय तस्मै ते यज्ञसूत्रं प्रकल्पये॥ ५७॥

जिनकी त्रिविध शक्तियोंसे यह सम्पूर्ण जगत् सदा तृप्त रहता है, जो स्वयं ही यज्ञसूत्ररूप हैं, उन्हीं आप प्रभुको मैं यज्ञसूत्र अर्पण करता हूँ।

भूषण

स्वभावसुन्दराङ्गाय नानाशक्त्याश्रयाय ते।
भूषणानि विचित्राणि कल्पयाम्यमरार्चित॥ ५४॥

देवपूजित प्रभो! आपके श्रीअङ्ग स्वभावसे ही परम सुन्दर हैं। आप नाना शक्तियोंके आश्रय हैं, मैं आपको ये विचित्र आभूषण अर्पण करता हूँ।

गन्ध

परमानन्दसौरभ्यपरिपूर्णदिगन्तरम् ।
गृहाण परमं गन्धं कृपया परमेश्वर॥ ५९॥

परमेश्वर! जिसने अपनी परमानन्दमयी सुगन्धसे सम्पूर्ण दिशाओंको भर दिया है, उस परम उत्तम दिव्य गन्धको आप कृपापूर्वक स्वीकार करें।

पुष्प

तुरीयवनसम्भूतं नानागुणमनोहरम्।
अमन्दसौरभं पुष्पं गृह्यतामिदमुत्तमम्॥ ६०॥

प्रभो! तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीयरूपी वनमें प्रकट हुए इस परम उत्तम दिव्य पुष्पको