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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 450 of 770

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Page 450

४४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

ग्रहण कीजिये। यह अनेक प्रकारके गुणोंके कारण अत्यन्त मनोहर है, इसकी सुगन्ध कभी मन्द नहीं होती।

केतकी, कुटज, कुन्द, बन्धूक (दुपहरिया), नागकेसर, जवा तथा मालती—ये फूल भगवान् शङ्करको नहीं चढ़ाने चाहिये। मातुलिङ्ग (बिजौरा नीबू) और तगर कभी सूर्यको नहीं चढ़ावे। दूर्वा, आक और मदार—ये सब दुर्गाजीको अर्पण न करे तथा गणेश-पूजनमें तुलसीको सर्वथा त्याग दे। कमल, दौना, मरुआ, कुश, विष्णुक्रान्ता, पान, दुर्वा, अपामार्ग, अनार, आँवला और अगस्त्यके पत्तोंसे देवपूजा करनी चाहिये। केला, बेर, आँवला, इमली, बिजौरा, आम, अनार, जंबीर, जामुन और कटहल नामक वृक्षके फलोंसे विद्वान् पुरुष देवताकी पूजा करे। सूखे पत्तों, फूलों और फलोंसे कभी देवताका पूजन न करे। मुने! आँवला, खैर, बिल्व और तमालके पत्र यदि छिन्न-भिन्न भी हों तो विद्वान् पुरुष उन्हें दूषित नहीं कहते। कमल और आँवला तीन दिनोंतक शुद्ध रहता है। तुलसीदल और बिल्वपत्र—ये सदा शुद्ध होते हैं। पलाश और कासके फूलोंसे तथा तमाल, तुलसी, आँवला और दूर्वाके पत्तोंसे कभी जगदम्बा दुर्गाजीकी पूजा न करे। फूल, फल और पत्रको देवतापर अधोमुख करके न चढ़ावे। ब्रह्मन्! पत्र-पुष्प आदि जिस रूपमें उत्पन्न हों, उसी रूपमें उन्हें देवतापर चढ़ाना चाहिये।

धूप

वनस्पतिरसं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
आघ्रेयं देवदेवेश धूपं भक्त्या गृहाण मे॥७१॥

देवदेवेश्वर! यह सूँघने योग्य धूप भक्तिपूर्वक आपकी सेवामें अर्पित हैं, इसे ग्रहण करें। यह वनस्पतिका सुगन्धयुक्त परम मनोहर दिव्य रस है।

दीप

सुप्रकाशं महादीपं सर्वदा तिमिरापहम्।
घृतवर्तिसमायुक्तं गृहाण मम सत्कृतम्॥७२॥

भगवन्! यह घीकी बत्तीसे युक्त महान् दीप सत्कारपूर्वक आपकी सेवामें समर्पित है। यह उत्तम प्रकाशसे युक्त और सदा अन्धकार दूर करनेवाला है। आप इसे स्वीकार करें।

नैवेद्य

अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम्।
भक्त्या गृहाण मे देव नैवेद्यं तृप्तिदं सदा॥७३॥

देव! यह छः रसोंसे संयुक्त चार प्रकारका स्वादिष्ट अन्न भक्तिपूर्वक नैवेद्यके रूपमें समर्पित है, यह सदा संतोष प्रदान करनेवाला है। आप इसे ग्रहण करें।

ताम्बूल

नागवल्लीदलं श्रेष्ठं पूगखादिरचूर्णयुक्।
कर्पूरादिसुगन्धाढ्यं यद्दत्तं तद् गृहाण मे॥७४॥

प्रभो! यह उत्तम पान सुपारी, कत्था और चूनासे संयुक्त है, इसमें कपूर आदि सुगन्धित वस्तु डाली गयी है; यह जो आपकी सेवामें अर्पित है, इसे मुझसे ग्रहण करें।

तत्पश्चात् पुष्पाञ्जलि दे और आवरण पूजा करे। जिस दिशाकी ओर मुँह करके पूजन करे उसीको पूर्व दिशा समझे और उससे भिन्न दसों दिशाओंका निश्चय करे। कमलके केशरोंमें अग्निकोण आदिसे आरम्भ करके हृदय आदि अङ्गोंकी पूजा करे। अपने आगे नेत्रकी और सब दिशाओंमें अस्त्रकी अङ्ग-मन्त्रोंद्वारा क्रमशः पूजा करे। क्रमशः शुक्ल, श्वेत, सित, श्याम, कृष्ण तथा रक्त वर्णवाली अङ्गशक्तियोंका अपनी-अपनी दिशाओंमें ध्यान करना चाहिये। उन सबके हाथमें वर और अभयकी मुद्रा सुशोभित है। 'अमुक आवरणके अन्तर्वर्ती देवताओंकी पूजा करता हूँ' ऐसा कहे। तत्पश्चात् अलंकार, अङ्ग, परिचारक, वाहन तथा आयुधोंसहित समस्त देवताओंकी पूजा करके यह कहे 'उपर्युक्त सब देवता पूजित तथा तर्पित होकर वरदायक हों'। मूलमन्त्रके अन्तमें निम्नाङ्कित वाक्यका उच्चारण करके इष्टदेवको पूजा समर्पित