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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 654 of 770

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Page 654

६५२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

जाता। वे ब्राह्मण देवता वेद-वेदाङ्गोंके पारदर्शी विद्वान् और तपस्वी थे। लोककर्ता ब्रह्माजीको देवताओंके साथ आया देख ब्राह्मणने उठकर मुनियोंसहित उन सबको प्रणाम किया और आसनपर बिठाकर भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीका स्तवन किया, तब प्रसन्न होकर लोककर्ता जगद्गुरु भगवान् ब्रह्माने मोहिनीके लिये उन राजपुरोहित ब्राह्मणसे इस प्रकार प्रार्थना की—'तात! आप ब्राह्मण हैं, सदाचारी हैं और परलोकमें उपकार करनेवाले हैं। कृपासिन्धो! कृपा कीजिये और मोहिनीको उत्तम गति प्रदान कीजिये। ब्रह्मन्! मोहिनी मेरी पुत्री है। मानद! यमलोकको सूना देखकर रुक्माङ्गदको मोहनेके लिये (प्रकारान्तरसे उस भक्तका गौरव बढ़ानेके लिये) मैंने ही उसे भेजा था। धर्मकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है। वह सम्पूर्ण लोकका कल्याण करनेवाली है। यह मोहिनी एक कसौटी थी, जिसपर सुवर्णरूपी राजा रुक्माङ्गदकी परीक्षा करके उन्हें स्त्री-पुत्रसहित भगवान्‌के धामको भेज दिया गया है। राजाने अविचल भक्तिसे एकादशी-व्रतका पालन करने और करानेके कारण यमराजकी लिपिको मिटाकर यमपुरीको सूना कर दिया था। ब्रह्मन्! सांख्यवेत्ताको जिसकी प्राप्ति असम्भव है, अष्टाङ्गयोगके साधनसे भी जो मिलनेवाला नहीं है, उस भक्तिगम्य पदकी प्राप्ति राजा, राजकुमार और देवी संध्यावलीको हुई है। मोहिनीने जो उस पुण्यशील भूपशिरोमणिके प्रतिकूल आचरण किया है, उस पापके वेगसे उसकी बड़ी दुर्दशा हुई है। आपके शापसे दग्ध होकर यह राखकी ढेरमात्र रह गयी है। इसके द्वारा जो अपकार हुआ है, उसे क्षमा कर दीजिये। दया कीजिये, शान्त होइये! आपके शाप देनेसे यह अधोगतिमें डाली गयी है। इसपर प्रसन्न होइये और इसे उत्तम गति दीजिये।'

ब्रह्माजीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन विप्रशिरोमणिने बुद्धिसे विचार करके क्रोध त्याग दिया और मोहिनीके पिता देवेश्वर श्रीब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा—'देव! आपकी पुत्री मोहिनी बहुत पापसे भरी हुई है, अतः प्राणियोंसे परिपूर्ण लोकोंमें उसकी स्थिति नहीं हो सकती। सुरेश्वर! जिस प्रकार आपका और मेरा भी वचन सत्य हो, देवताओंका कार्य सिद्ध हो और मोहिनीकी आवश्यकता भी पूर्ण हो जाय, वही करना चाहिये। अतः जो भूतसमुदायसे कभी आक्रान्त न हुआ हो, उसी स्थानपर मोहिनी रहे।'

नृपश्रेष्ठ! तब ब्रह्माजीने सम्पूर्ण देवताओंसे सलाह लेकर मोहिनी देवीसे कहा—'तुम्हारे लिये कहीं स्थान नहीं है।' यह सुनकर मोहिनी सम्पूर्ण देवताओंको प्रणाम करके बोली—'सुरश्रेष्ठगण! आप सब देवता सम्पूर्ण लोकके साक्षी हैं। पुरोहितजीके साथ आप लोगोंको सौ-सौ बार प्रणाम करके मैं हाथ जोड़ती हूँ। आप प्रसन्न हृदयसे मेरी याचना पूर्ण करें। मुझे वह