संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 655 of 770
Read in context- उत्तरभाग * ६५३
स्थान दें, जो सबके लिये प्रीतिकारक हो। दूसरोंको मान देनेवाले महात्माओ! किसी दोषसे दूषित एकादशीका दिन जिस प्रकार मेरा हो जाय, ऐसा कीजिये—यही मेरी याचना है। इसे आप अवश्य पूर्ण कर दें। यह माँग मैंने स्वार्थसिद्धिके लिये की है।'
मोहिनीको दशमीके अन्तभागमें स्थानकी प्राप्ति तथा उसे पुनः शरीरकी प्राप्ति
देवता बोले—मोहिनी! निशीथकालमें जिसका दशमीसे वेध हो, वह एकादशी देवताओंका उपकार करनेवाली होती है और सूर्योदयमें दशमीसे वेध होनेपर वह असुरोंके लिये लाभदायक होती है। यह व्यवस्था स्वयं भगवान् विष्णुने की है। त्रयोदशीमें पारण हो तो वह उपवास व्रतका नाश करनेवाला होता है। वैष्णव-शास्त्रमें जो आठ महाद्वादशियाँ* बतायी गयी हैं, वे एकादशीसे भिन्न हैं। वैष्णवलोग उनमें उपवास करते हैं। वैष्णव महात्माओंका एकादशी व्रत भिन्न हैं। दोनों पक्षोंमें वह नित्य बताया गया है। विधिपूर्वक किये जानेपर वह तीन दिनमें पूरा होता है। एकादशीके पहले दिन सायंकालका भोजन छोड़ दे और दूसरे दिन प्रातःकालका भोजन त्याग दे। यदि एकादशी दो दिन हो या प्रथम दिन विद्ध होनेके कारण त्याज्य हो तो दूसरे दिन उपवास करना चाहिये। द्वादशीमें निर्जल उपवास करना उचित है। जो सर्वथा उपवास करनेमें असमर्थ हों, उनके लिये जल, शाक, फल, दूध अथवा भगवान्के नैवेद्यको ग्रहण करनेका विधान है; किंतु वह अपने स्वाभाविक आहारकी मात्राके चौथाई भागके बराबर होना चाहिये। साध्वी ! स्मार्त (स्मृतियोंके अनुसार चलनेवाले गृहस्थ) लोग सूर्योदयकालमें दशमीविद्धा एकादशीका त्याग करते हैं, परंतु निष्काम एवं विरक्त वैष्णवजन आधी रातके समय भी दशमीसे विद्ध होनेपर उस एकादशीको त्याग देते हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें यह बात विदित है कि दशमी यमराजकी तिथि है। अनघे ! उस दशमीके अन्तिम भागमें तुम्हें निवास करना चाहिये। तुम दशमी तिथिके अन्तिम भागमें स्थित होकर सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंके साथ संचरण करोगी। अब तुम अपने पापका नाश करनेके लिये पृथ्वीपर सब तीर्थोंमें भ्रमण करो। अरुणोदयसे लेकर सूर्योदयतकका जो समय है, उसके भीतर तुम व्रतमें स्थित होकर
*आठ महाद्वादशियोंके नाम इस प्रकार हैं—उन्मीलनी, वञ्जुली, त्रिस्पृशा, पक्षवर्धिनी, जया, विजया, जयन्ती और पापनाशिनी। इनमेंसे प्रारम्भकी चार द्वादशियाँ तिथियोगसे विशेष संज्ञा धारण करती हैं और अन्तकी चार द्वादशियोंके नामकरणमें भिन्न-भिन्न नक्षत्रोंका योग कारण है। दशमी-वेधरहित एकादशी जब एक दिनसे बढ़कर दूसरे दिन भी कुछ समयतक दिखायी दे और द्वादशी न बढ़े तो वह 'उन्मीलनी' महाद्वादशी कहलाती है। जब एकादशी एक ही दिन हो और द्वादशी बढ़कर दूसरे दिनतक चली गयी हो तो वह 'वञ्जुली' कहलाती है। इसमें द्वादशीमें उपवास और द्वादशीमें ही पारण होता है। जब अरुणोदयकालमें एकादशी, दिनभर द्वादशी और दूसरे दिन प्रातःकाल त्रयोदशी हो 'त्रिस्पृशा' नामक महाद्वादशी होती है। जिस पक्षमें अमावास्या या पूर्णिमा एक दिन साठ दण्ड रहकर दूसरे दिनमें भी कुछ समयतक चली गयी हो, उस पक्षकी द्वादशीको 'पक्षवर्धिनी' कहते हैं। द्वादशीके साथ पुनर्वसु-नक्षत्रका योग हो तो वह 'जया', श्रवण-नक्षत्रका योग हो तो 'विजया', पुष्यका योग हो तो 'पापनाशिनी' तथा रोहिणीका योग हो तो 'जयन्ती' कहलाती है।