संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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गङ्गामें मिली हैं। उसमें गोता लगानेवाला मनुष्य इन्द्रका प्रिय अतिथि होता है। मोहिनी ! जह्नुकुण्ड नामक महातीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारक होता है। शुभगे ! तदनन्तर अदिति-तीर्थ है, जहाँ अदितिने कश्यपसे भगवान् विष्णुको वामनरूपमें प्राप्त किया था। वहाँ किये जानेवाले स्नानका फल महान् अभ्युदय बताया गया है। तत्पश्चात् शिलोच्चय नामक महातीर्थ है, जहाँ तपस्या करके समस्त प्रजा तृण आदिके साथ स्वर्गको चली जाती है; क्योंकि वह स्थान अनेक तीर्थोंका आश्रय है। तदनन्तर इन्द्राणी नामक तीर्थ है, जहाँ | इन्द्राणीने तपस्या करके इन्द्रको पतिरूपमें प्राप्त किया था। यह स्थान प्रयागके तुल्य सेवन करने योग्य है। उसके बाद पुण्यदायक स्नात तीर्थ है, जहाँ क्षत्रिय विश्वामित्रने तपस्या करके तीर्थ-सेवनके प्रभावसे ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त किया था। तत्पश्चात् प्रद्युम्न-तीर्थ है, जो तपस्याके लिये प्रसिद्ध है। वहाँ कामदेव तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णके प्रद्युम्न नामक पुत्र हुए। उस तीर्थमें स्नान करनेसे महान् अभ्युदयकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर दक्षप्रयाग है, जहाँ गङ्गासे यमुना मिली हैं। वहाँ स्नान करनेसे प्रयागकी ही भाँति अक्षय पुण्य होता है।
गङ्गाजीके तटपर किये जानेवाले स्नान, तर्पण, पूजन तथा विविध प्रकारके दानोंकी महिमा
पुरोहित वसु कहते हैं— राजपत्नी मोहिनी ! अब गङ्गाजीमें स्नान-तर्पण आदि कर्मोंका फल बतलाया जाता है। देवि ! यदि गङ्गाजीके तटपर संध्योपासना की जाय तो द्विजोंको पवित्र करनेवाली गायत्रीदेवी किसी साधारण स्थानकी अपेक्षा वहाँ लाख गुना पुण्य प्रकट करनेमें समर्थ होती हैं। मोहिनी ! यदि पुत्रगण श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीमें पितरोंको जलाञ्जलि दें तो वे उन्हें अक्षय तथा दुर्लभ तृप्ति प्रदान करते हैं। गङ्गाजीमें तर्पण करते समय मनुष्य जितने तिल हाथमें लेता है, उतने सहस्र वर्षोंतक पितृगण स्वर्गवासी होते हैं। सब लोगोंके जो कोई भी पितर पितृलोकमें विद्यमान हैं, वे गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। शुभानने ! जो जन्मकी सफलता अथवा संतति चाहता है, वह गङ्गाजीके समीप जाकर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। जो मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर दुर्गतिमें पड़े हैं, वे अपने वंशजोंद्वारा कुश, तिल और गङ्गाजलसे तृप्त किये जानेपर वैकुण्ठधाममें चले जाते हैं। जो | कोई पुण्यात्मा पितर स्वर्गलोकमें निवास करते हैं, उनके लिये यदि गङ्गाजलसे तर्पण किया जाय तो वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। जो मनुष्य गङ्गाजीमें स्नान करके प्रतिदिन शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह निश्चय ही एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अग्निहोत्र, वेद तथा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी गङ्गाजीपर शिवलिङ्ग-पूजाके करोड़वें अंशके बराबर भी नहीं हैं। जो पितरों अथवा देवताओंके उद्देश्यसे गङ्गाजलद्वारा अभिषेक करता है, उसके नरकनिवासी पितर भी तत्काल तृप्त हो जाते हैं। मिट्टीके घड़ेकी अपेक्षा ताँबेके घड़ेसे किया हुआ स्नान दसगुना उत्तम माना गया है। इसी प्रकार अर्घ्य, नैवेद्य, बलि और पूजा आदिमें भी क्रमशः समझने चाहिये। उत्तरोत्तर पात्रमें विशेषता होनेके कारण फलमें भी विशेषता होती है। जो धन होते हुए भी मोहवश विस्तृत विधिका पालन नहीं करता, वह उस कर्मके फलका भागी नहीं होता।<br><br>देवताओंका दर्शन पुण्यमय होता है। दर्शनसे