भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 770 में से

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पृष्ठ 665

* उत्तरभाग * ६६३

स्पर्श उत्तम है। स्पर्शसे पूजन श्रेष्ठ है और पूजनमें भी घृतके द्वारा कराया हुआ देवताका स्नान परम उत्तम माना गया है। गङ्गाजलसे जो स्नान कराया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष घृतस्नानके ही तुल्य कहते हैं। जो ताँबेके पात्रमें मगधदेशीय मापके अनुसार एक प्रस्थ गङ्गाजल रखकर उसमें दूसरे-दूसरे विशेष द्रव्य मिलाकर उस मिश्रित जलके द्वारा अपने पितरोंसहित देवताओंको एक बार भी अर्घ्य देता है, वह पुत्र-पौत्रोंके साथ स्वर्गलोकको जाता है। जल, क्षीर, कुशाग्र, घृत, दधि, मधु, लाल कनेरके फूल तथा लाल चन्दन—इन आठ अङ्गोंसे युक्त अर्घ्य सूर्यके लिये देनेयोग्य कहा गया है। जो श्रेष्ठ मानव गङ्गाजीके तटपर भगवान् विष्णु, शिव, सूर्य, दुर्गा तथा ब्रह्माजीकी स्थापना करता है और अपनी शक्तिके अनुसार उनके लिये मन्दिर बनवाता है, उसे अन्य तीर्थोंमें यह सब करनेकी अपेक्षा गङ्गाजीके तटपर कोटि-कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन गङ्गाजीके तटकी मिट्टीसे यथाशक्ति उत्तम लक्षणयुक्त शिवलिङ्ग बनाकर उनकी प्रतिष्ठा करके मन्त्र तथा पत्र-पुष्प आदिसे यथासाध्य पूजा करता और अन्तमें विसर्जन करके उन्हें गङ्गामें ही डाल देता है, उसे अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। जो नरश्रेष्ठ सर्वानन्ददायिनी गङ्गाजीमें स्नान करके भक्तिपूर्वक ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करता है, मुक्ति उसके हाथमें ही आ जाती है। जो नियमपूर्वक छः मासतक गङ्गाजीमें ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रका जप करता है, उसके पास सब सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। जो गङ्गाजीके समीप प्रणवसहित ‘नमः शिवाय’ मन्त्रका विधिपूर्वक चौबीस लाख जप करता है, वह साक्षात् शङ्कर (-के समान) है। ‘नमः शिवाय’—यह पञ्चाक्षरी मन्त्र सिद्ध-विद्या है। उसको जपनेवाला साक्षात् शिव (-के समान) ही है, इसमें संशय नहीं है। ‘अपवित्रः पवित्रो वा*’—इस मन्त्रका जप करनेवाला पुरुष पातकरहित हो जाता है। गङ्गाजीके पूजित होनेपर सब देवताओंकी पूजा हो जाती है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके देवनदी गङ्गाकी पूजा करनी चाहिये। गङ्गाजीके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। वे सम्पूर्ण अङ्गोंसे सुशोभित होती हैं। उनके एक हाथमें रत्नमय कलश, दूसरेमें श्वेत कमल, तीसरेमें वर और चौथेमें अभय है। वे शुभ-स्वरूपा हैं।

उनके श्रीअङ्गोंपर श्वेत वस्त्र सुशोभित होता है। मोती और मणियोंके हार उनके आभूषण हैं। उनका मुख परम सुन्दर है। वे सदा प्रसन्न रहती हैं। उनका हृदय-कमल करुणारससे सदा आर्द्र बना रहता है। उन्होंने वसुधापर सुधाधारा बहा रखी है। तीनों लोक सदा उनके चरणोंमें नमस्कार करते हैं। इस प्रकार जलमयी गङ्गाका ध्यान


* अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥