निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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अपना लिखने का स्टाइल है। तो भी आप पूछते हैं कि डॉ० ने क्या कहा? वे बताते हैं कि यह बताया है। तो आप दवा बताते हैं कि यह करना। पर वो सुनते नहीं हैं।
उदाहरण के लिए एक दिन एक माई आई, उसने कहा कि भूख नहीं लगती। आप जान गये कि क्या समस्या है इसे। आपने कहा कि सुबह मूली, पपीता, खीरा खाना। क्योंकि तीनों भूख वर्द्धक हैं। साथ में कहा कि सुबह एक गिलास पानी में शहद मिलाकर पीना। आप नज़र से पढ़ लेते हैं कि क्या बीमारी है। जब आप दवा बताने लगे तो वो बीच में ही बोल पड़ी कि बड़ी दवाएँ की हैं। आपकी सुने ही न। आपने तो उसकी सारी बात सुन ली, पर वो आपकी बात सुनने को तैयार नहीं थी। फिर तीसरा आपने कहा कि नाम भजन करना। फिर उसने सवाल किया कि दवा खाएँ कि नहीं। आप दवा के लिए कभी मना नहीं करते। आपका मानना है कि यह काम तो मूर्खों वाला है। तो यह हाल कोई एक माई का नहीं है, सबका यही हाल होता है। समस्या बताते हैं तो आप ध्यान से सुनते हैं; पर जब आप उसका हल बताते हैं तो वो सुनने को तैयार नहीं होते हैं और आपका कीमती समय नष्ट करते हैं।
जब आप किसी धर्मस्थान पर जाते हैं
आपने सभी धर्मस्थानों को देखा है। कहीं-कहीं आप यह देखने के लिए चुपके से चले जाते हैं कि देखता हूँ कि वहाँ क्या-क्या चल रहा है। कहीं पर बलि के नाम पर रोज़ हज़ारों जीवों की हत्या की जाती देखी, कहीं कुछ। खैर, यह तो धर्म के नाम पर हो रहे पाप की बात हुई,