निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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हैं। आपने कहा कि जाने दो, फिर क्या है, सबको जाना है एक दिन। पर आपके ट्रस्टियों ने बार-बार आग्रह किया तो आपने विचार किया। जब आपको लगा कि इसकी अभी यहाँ पर ज़रूरत है तो ही आपने मजबूरी में उसमें प्राण फूँके।
यह एक की बात नहीं है, सैंकड़ों की बात है। पर यह काम आप बड़े चुपके से कर देते हैं। जब भी किसी में प्राण फूँकते हैं तो फिर उसे बता देते हैं कि अब बहुत ही सावधानी से काम करना, तुम्हें पुनर्जन्म मिला है; यदि कुछ गलत किया तो मैं भी भागीदार हो जाऊँगा।
मस्तगढ़, जम्मू के पंडित प्रभु दयाल जी ने पीलिया की बीमारी में प्राण त्याग दिये। उन्हें आप-ही-आप दिखने लगे। तब उनके पार्थिक शरीर को लेकर राँजड़ी लाया गया। सुबह के 5 बजे थे। उन्हें एक कुल्ले में लिटाया गया। जब आपने द्वार खोला तो उनका बेटा सामने था। आपने उससे पूछा कि आज इतनी सुबह कैसे आना हुआ; पंडित जी कहाँ हैं? तब वो अपने पिता जी को आपके समक्ष लाया। आपकी नज़र पड़ते ही उनके शरीर में प्राण वापिस आ गये। आपने पंडित जी से कहा-अरे पंडित जी! आप तो चले गये थे। वे आपके चरणों पर गिर पड़े; बंदगी की और रोने लगे। तब आपने उन्हें प्रसाद दिया और बहुत कुछ समझाकर घर भेज दिया।
नौग्राम की रक्षा बहन जी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बीमारियों के कारण उनका शरीर छूट गया। हार्ट की भी उन्हें तकलीफ़ थी और अन्य छोटी-छोटी बीमारियाँ भी थीं। घर वाले उनके पार्थिक शरीर को लेकर आपके पास आए। आपने कहा कि अभी तो इनकी ज़रूरत है। तब आपने उनमें प्राण फूँके और फिर समझाया कि इस शरीर से अब कोई गलत काम नहीं लेना; इसे मेरा ही मानना; आपने तो छोड़ दिया था।
इसके अलावा हज़ारों लँगड़ों, हज़ारों पागलों को आपने ठीक किया है। अन्य भी कई बीमारों को, जो किसी डाक्टर के इलाज़ से ठीक नहीं हो पाए होते हैं, उन्हें भी अच्छा किया है। पर यह काम आप इतने चुपके से करते हैं कि वो ख़बर फैल नहीं पाती है। यह इसलिए करते हैं