निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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आप हर समय इतने कण्ट्रोल में रहते हैं, इतने कंसन्ट्रेट रहते हैं कि कोई नहीं रह सकता है।
आपकी किसी से स्पर्द्धा (Compitetion)
नहीं है
आज प्रतिस्पर्द्धा का युग है। जीवन के हरेक क्षेत्र में स्पर्द्धा है। सब एक-दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। उसके लिए वे छल-कपट आदि का सहारा भी लेने से चूकते नहीं हैं। यह प्रतिस्पर्द्धा धर्म-क्षेत्र में भी साफ़ दिखाई देती है। एक पंथ दूसरे से आगे निकलना चाहता है। सब अपनी संख्या बढ़ाने में लगे हुए हैं। पर आपकी किसी से स्पर्द्धा नहीं है। यह एक बड़ा ही प्यारा रहस्य है।
स्पर्द्धा बराबर वालों में होती है। जिसके बराबर पहुँचकर हम उससे आगे निकल सकें, उससे स्पर्द्धा की जा सकती है। पर आप सबसे निराले हैं। आपकी बराबरी का प्रश्न ही नहीं उठता है। इसलिए किसी से स्पर्द्धा वाली बात ही नहीं है।
इसमें स्पर्द्धा इस बात की नहीं होती है कि किस पंथ के पास कितनी ज़मीन है, कितनी जायदाद है। यह तो ईर्ष्या वाली बात है। यह तो हौसला पस्त करने वाली बात है। जो चीज़ आपके पास है, वो किसी के पास है ही नहीं, फिर स्पर्द्धा किससे करनी!
चाहे किसी के पास 70-80 लाख सत्संगी हों या एक करोड़, पर उससे आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। आपने सन् 1970 में सबसे पहले आदमी को नाम दिया था। वो राजस्थान का था। उसका नाम था-नीरसिंह राठौर। उसे आपने सबसे पहले नाम दिया था। जब आपने उसे नाम दिया तो कहा कि हमारा पंथ दुनिया का सबसे बड़ा पंथ है, क्योंकि इससे न्यारा मार्ग किसी के पास नहीं है।
अब किसी की कोयले की दुकान है तो उसकी सोने का