निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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भी नहीं कर पायेगा। वो दुनिया को खुश रखना चाह रहा है। उसकी कोई निंदा भी नहीं होगी। जबकि एक महात्मा की पहचान ही निंदा है। ‘जब चारों ओर मार मार धाए, तब लालों के लाल कहाय ॥’ जिसकी निंदा नहीं वो महात्मा नहीं हो सकता। क्यों है निंदा! 13 अगस्त 1985 को आप राँजड़ी में आए। इस दौरान कभी किसी माई ने नहीं कहा कि उसे छेड़ा है; पर दुनिया कितनी जालिम है, कहा कि दो लड़कियों को लेकर भाग गया। जब 25 साल के थे, तब आपने विवाह नहीं किया। कोई आँख ख़राब नहीं थी, कोई बीमारी नहीं थी; अगर ज़रूरत होती तो कोई मिल जाती। अब बूढ़ा होकर भागना था क्या! ख़ैर हमारे देश की परंपरा है कि यहाँ हड्डियों की पूजा ही होती है। आप जो मना करते हैं कि भूत-प्रेतों की पूजा नहीं करो, सयानों से बचो, इससे सयानों का नुक़सान है, उनकी आमदनी पर लात बजती है। जब कोई आपसे नाम लेता है तो वो भूत-प्रेत से न्यारा हो जाता है, औरों को भी लाता है। अब जिस सयाने ने उसे सालों से फँसाया होता है, वो परेशान हो जाता है। उसकी आमदनी कम हो जाती है। तो वो निंदा शुरू कर देता है। आपने कभी संगत को नहीं कहा कि सयानों को पकड़ कर मारो, आपने कभी नहीं कहा कि शिवजी बुरे हैं। विरोध तो इन बातों से है कि आप कहते हैं कि हत्या नहीं मनाना, चंदा नहीं करना। एक महात्मा आता है तो पहले 100-100 रुपये और 5-5 किलो चीनी लेता है। समाज कब सोचेगा! इन लोगों की आमदनी आपके कारण से कम हो रही है। इसलिए निंदा करते हैं। अपने हितों के लिए, अपने स्वार्थों के लिए निंदा करते हैं, कोई दोषों के लिए नहीं। वास्तविकता तो जानते हैं।
वास्तव में आप 10 साल में जो इतना मशहूर हुए, उसमें 70 प्रतिशत सहयोग तो निंदकों का रहा है। किसी की कोई निंदा करे तो कहता है कि मर जाए उधर ही, कीड़े पड़ जाएँ, पर आप चिंतित नहीं होते हैं। आप मानते हैं कि निंदक ही आपके सच्चे प्रचारक हैं। इसलिए आपने कभी उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही भी नहीं की।