निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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एक समय आप अखनूर जा रहे थे तो नेर्शानल हाइवे पर आपको एक पागल मिला। वो केवल कमीज़ पहने था, नीचे कुछ नहीं पहने था; बिलकुल नंगा था। वो सड़क पर से पत्थर उठा-उठा कर साइड पर रख रहा था। आपने सोचा कि कोई रात के समय उस पर गाड़ी चढ़ा सकता है। आपके दिल में उसके प्रति दया की भावना उमड़ आई। आपने उसी समय फैसला किया कि आप पागलों के लिए अलग से एक आश्रम बनवाकर वहाँ उनकी सेवा करेंगे।
आप ऐसे लोगों की तलाश करते हैं। आपको ऐसे लोगों की ज़रूरत है, जिन्हें दुनिया ने ठुकरा दिया हो। दुनिया जिन्हें बेघर कर देती है, आप उन्हें शरण देने की ठान लेते हैं। आप सभी पागलों को इकट्ठा करना चाहते हैं। तभी तो आप इनके लिए एक अलग आश्रम बनाना चाहते हैं जहाँ ऐसे लोगों की जमकर सेवा की जा सके। आप कहते हैं कि यही मेरा काम है, क्योंकि इन्हें कोई नहीं पूछ रहा है, इन्हें कोई नहला नहीं रहा है, कोई खिला नहीं रहा है, घर वालों ने इन्हें घर से बाहर कर दिया है। आपका धर्म ही सेवा है तो इससे बेहतर पात्र नहीं मिलेंगे। आप अपने लोगों को ऐसे लोगों को ढूँढ़ने में लगाएँगें। जहाँ भी दया का कोई ऐसा पात्र मिल जाए, उसे आश्रम में लाया जायेगा और फिर उसकी सेवा की जायेगी। फेरी वाला वहीं जाता है, जहाँ ग्राहक हों। आपका काम ही परमार्थ है, इसलिए आप उन्हें लाना चाहते हैं, आश्रम में रखकर उन्हें नहलाना चाहते हैं, पूरी ड्यूटी के साथ उनकी सेवा करना चाहते हैं। आप अपना काम खुद करते हैं, किसी से अपनी सेवा नहीं करवाते, इसलिए आप अपने लोगों को इनकी सेवा में लगाना चाहते हैं। आप कहते हैं कि यही मेरी सेवा होगी।
आप सबमें एक आत्मा देखते हैं, इसलिए आप पहले उन लोगों को चुनते हैं, जिन्हें सेवा की ज़रूरत है। जब कभी भण्डारा होता है तो