निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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कुछ बागड़ियों के बच्चे भी खाने के लिए आ जाते हैं। कभी आपके लोग उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं, पर आप कहते हैं कि इन्हें भगाओ नहीं, बल्कि पहले इन्हें खिलाओ; इनको ज़्यादा ज़रूरत है इसकी, आपको नहीं।
भोपाल में एक भण्डारा हुआ तो बागड़ियों को सेवादारों ने भगाना चाहा। आपने कहा कि मैंने यह इंतज़ाम अमीरों के लिए नहीं किया है, बड़े लोगों के लिए नहीं किया है, अच्छे कपड़े वालों के लिए नहीं किया है। ये अधिक ज़रूरतमंद हैं, पहले इन्हें खिलाओ। वो कहने लगे कि ये माँस खाते हैं, हम इन्हें इन थालियों में नहीं खिला सकते हैं। आपने कहा कि फिर इनके लिए पत्तलों का इंतज़ाम करो। क्योंकि आप ऐसे ही लोगों की सच्चे दिल से सेवा करना चाहते हैं। यही सेवा के सच्चे हक़दार हैं। जब आपका लक्ष्य ही सेवा है तो इससे बेहतर पात्र कहाँ मिलेंगे! आप तो उन बूढ़ों के लिए भी आश्रम बनवा रहे हैं, जिन्हें घर से बेघर कर दिया गया है। आप उनकी भी सेवा करना चाहते हैं। यह मनुष्य तो स्वार्थी है, दुनिया में रहने वाला हर इंसान स्वार्थी है, पर आप दुनिया में नहीं रहते हैं, हर समय अपने में ही रहते हैं, इसलिए आप परमार्थी हैं, हर समय परमार्थ में ही लगे रहते हैं। यही आपका लक्ष्य है।
दुनिया के लोग तेरा-मेरा करते हैं, पर आपके लिए सब अपने हैं। अपनापन होने से ही दूसरों से मनुष्य घृणा करता है, अपनो से नहीं। आपको हर प्राणी अपना लगता है। संपूर्ण विश्व को आप अपना मानते हैं। आपको सबकी पीड़ा अपनी लगती है।
आपकी जीभ थक जाती है। आप कहते हैं कि ख़ामोश! तुझे बोलना ही बोलना है। आँखें थक जाती हैं। आप कहते हैं कि देखो; तुम्हें देखना-ही-देखना है। आप आत्मनिष्ठ होकर जीते हैं। आप मानते हैं कि