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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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54 साहिब बन्दगी

वर्तमान में छल, कपट, पाप, अहिंसा, अशांति का वातावरण हो गया है। आखिर क्या किया जाए, जिससे मनुष्य इन सब पाप-कर्मों से दूर हो जाए और एक नेक इंसान बने।

बड़े-2 महात्माओं ने अपने-अपने विचार रखे। किसी ने कहा कि जाप करो, शांति हो जाएगी; किसी ने कहा कि योग करो; किसी ने कहा नमाज़ पढ़ो; किसी ने कहा कि तीर्थ करो। आपने सबकी बात सुनी। आपको घोर आश्चर्य इस बात का हुआ कि कोई एक भी मूल कारण नहीं जानता था। कोई नहीं जानता था कि मनुष्य पाप कर्म क्यों कर रहा है; कोई नहीं जानता था कि मनुष्य अच्छा कैसे हो सकता है; कोई एक भी आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित नहीं था; कोई एक भी विदेह नाम से परिचित नहीं था। उन्हें नहीं पता था कि यह आदमी अपनी ताक़त से नहीं सुधर सकता है। कबीर साहिब ने यही तो समझाया है-

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।
गृह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा॥

यानी जिन्होंने इतनी कठिन तपस्या की कि काया को गला दिया, वो भी नहीं समझ पाए। फिर आम इंसान को इन चीज़ों से सुधारने की कोशिश करने वाले कितने अज्ञानी थे!

वास्तव में मन ही इंसान से पाप कर्म करवा रहा है। यही निरंजन है। इस बात का किसी को पता नहीं था। फिर सत्य-पुरुष का सच्चा नाम ही मनुष्य को इस मन से बचाकर अच्छा बना सकता है। यही उसे पार भी करेगा। इंसान के मन को निर्मल करने वाली कोई वस्तु है तो परम पुरुष का सच्चा नाम, जो सद्गुरु के पास होता है। सद्गुरु से ही इस नाम को पाया जा सकता है। यह वाणी से परे विदेह नाम होता है। यह स्वयं परम सत्ता होती है। बाकी जो गुरु लोग होते हैं, उनके पास काया का नाम होता है, जो निरंजन का नाम है। सब नाम निरंजन के हैं, पर परम पुरुष का यह विदेह नाम किसी संत के पास ही हो सकता है। जिसके पास यह