निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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वहाँ। इतने बड़े पंथ को छोड़कर आप साहिब-बंदगी में चली गयीं। आपको क्या अंतर दिखा वहाँ? माई ने बड़ा प्यारा जवाब दिया, कहा कि वो महाराज है सौखों का और राँजड़ी वाला है औखों का।
राँजड़ी में सुबह-सुबह कई परेशान, बीमार आते हैं; अपनी-2 समस्याएँ लाते हैं। आप यह नहीं देखते कि यह ग़रीब है या अमीर; आप सबकी सुनते हैं। आपमें किसी तरह की भेद-दृष्टि नहीं है। आप तो केवल आने वाले का प्रेम, उसका विश्वास, उसकी प्रार्थना को ही देखते हैं।
इसलिए जगह जगह आश्रम
बनवाते हैं आप
आपने जो इतने अधिक आश्रमों को निर्माण करवाया, जगह-जगह आश्रम बनवाए, इसके पीछे भेद है। डोडा की एक माई ने आपसे नाम लिया। वो भक्त थी। पर कुछ महीने वो सत्संग में नहीं आई। बहुत देर बाद जब मिली तो आपने न आने का कारण पूछा। माई ने कहा कि गुरु जी, इतनी दूर से राँजड़ी आने में बहुत पैसे लगते हैं; मैं ग़रीब हूँ। आपने उसी समय फैसला किया कि वहाँ आश्रम बनवाऊँगा।
ऐसे ही मण्डी के एक महात्मा जी ने नाम लिया। उनके शिष्यों ने भी नाम ले लिया। पर कुछ समय न देखा तो आपने महात्मा जी से पूछा कि आपके चेले अब नहीं आ रहे हैं, क्या बात है? तो उन्होंने बताया कि मण्डी से राँजड़ी तक पहुँचने में 700 रूपये लगते हैं और तीन दिन लग जाते हैं। इसलिए आप खुद हरेक जगह आश्रम बनवाकर वहाँ जा रहे हैं।
ऐसे फिर आप जगह-जगह पहले आश्रम बनवाने लगे और फिर भक्तों को इकट्ठा करने लगे। 10-10, 15-15 कि. मी. की दूरी पर आपने आश्रम बनवाए। ग़रीब संगत आपके दर्शन करने नहीं पहुँच पाती है, यह सोचकर सद्गुरु जी स्वयं उन्हें दर्शन देने प्रत्येक आश्रम में जाते हैं।