निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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इस बार ऐसा था कि वहाँ पर दो माइक लगे थे। एक छोटा माइक था, जहाँ से स्कूली बच्चे गाँधी के विचारों का प्रचार कर रहे थे और दूसरा बड़ा मॉइक था, जो बड़े आमंत्रित लोगों के बोलने के लिए था।
जब तक सारे आमंत्रित लोग न पहुँच गये, तब तक बच्चे उस छोटे मॉइक से बोले जा रहे थे। जैसे ही आप पहुँचे, आपको भी उस छोटे मॉइक पर बोलने के लिए बुला लिया गया। अब उस मॉइक से सभी तक आवाज़ नहीं पहुँच पा रही थी और फिर उस समय शोर भी बहुत था; नारे लगाए जा रहे थे। आपने तो भी वहीं से बोला। अब भी अन्दर में चालाक लोगों का दिल नहीं भरा तो बीच-बीच में आपको रोकना शुरू कर दिया और आने वाले के लिए सूचित करते रहे और ऐसे ही बीच में ही आपको रोक दिया गया और आपकी बात अधूरी ही रह गयी।
बाद में जब सब लोग आ गये तो आपको दिखावे के लिए मात्र उनके साथ बिठाया गया। सबको उस बड़े मॉइक पर बोलने का अवसर प्रदान किया गया जबकि आपको केवल वहाँ बिठाए रखा, बोलने का अवसर वहाँ से नहीं दिया गया, जहाँ से आपकी आवाज़ सब सुन सकें, आप अपनी बात सब तक पहुँचा सकें। क्या यह नाइंसाफ़ी नहीं थी। क्या यह चालाकी नहीं थी! पर फिर भी आपकी शालीनता तो देखो, जाते समय आपने दोनों हाथ जोड़कर उसे धन्यवाद किया, जिसने आपको उस माइक पर बोलने का अवसर नहीं दिया और बच्चों वाले माइक से बोलने को कहा।
यह केवल एक किस्सा नहीं है। हर बार जहाँ भी आपको आमंत्रित किया जाता है, पाखण्डियों की टीम इकट्ठा होकर साज़िश रच लेती है और कुछ ऐसा कर दिया जाता है कि आपको बोलने का अधिक अवसर नहीं दिया जाता। पाखण्डी जानते हैं कि आपको