निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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Read in context| 66 | साहिब बन्दगी |
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बोलने का अधिक अवसर देने का मतलब है लोगों का आपसे प्रभावित होकर आपके साथ जुड़ना।
एक संत को आमंत्रित कर उनका ऐसा अपमान करना केवल असभ्यता की ही निशानी है।
भोजन बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं आप
जो कोई आपके हाथ का बना भोजन एक बार खा ले तो वो कभी जिंदगी भर भूल नहीं सकता है। कई-कई दिन तक आप राँजड़ी में स्वयं भोजन बनाते हैं। फौज में एक बार आपको भी लाँगरी की मदद के लिए जाना पड़ा। उस दिन आपने भोजन बनाया। जब सबने खाया तो कहा कि आज तो भोजन बहुत ही स्वादिष्ट बना है, किसने बनाया है? जब पता चला कि आपने बनाया है तो सबने कहा कि अब आप ही भोजन बनाया करें। आपने कहा कि मैं कोई लाँगरी भर्ती नहीं हुआ हूँ। मैंने कोई ट्रेनिंग भी नहीं की है। पर फिर भी आपको महीना-2 भर भोजन बनाने में लगाए रखते थे।
यह काम आपने 8-9 साल की उम्र में ही सीख लिया था। जब भी माँ बीमार होती तो वो आपसे उम्मीद रखती थी। आप भोजन भी बना लेते थे, कपड़े भी धो लेते थे।
आपके बड़े-बड़े हलवाई भी शिष्य हैं। वे कहते हैं कि जो फार्मूला आपके पास है, वो हम नहीं जानते हैं। वो खुद कहते हैं। सच है कि आपके हाथों में ही कुछ जादू है।
आपने अपने गुरुदेव को भी बहुत बार भोजन बनाकर खिलाया। आपके हाथों का भोजन खाकर गुरुदेव भी बहुत प्रसन्न होते थे। आपके हाथ का भोजन खाने के लिए वे दो महीने आश्रम से बाहर नहीं जाते थे। चाहे कोई भी बुलाता था, वे नहीं जाते थे। वे आपसे कहा करते थे कि जो तुम्हारे हाथ का भोजन खा लेगा, वो साधु हो जायेगा। क्योंकि उसमें कुछ और भी खास बात रहती है, जिसे आपके गुरुदेव समझ गये थे।