निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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जब भी अखनूर में बड़े प्रोग्राम होते हैं तो आप स्वयं ही भोजन बनाते हैं। राँजड़ी में कभी कुछ तो कभी कुछ बनाकर सबको खिलाते हैं। जब यात्रा होती है तो सब थके हुए होते हैं। तब भी आप स्वयं ही सबको बना-बनाकर खिलाते हैं। वो नज़ारा देखते ही बनता है। यात्रा के दौरान किसी आश्रम में पहुँचकर जब सभी थककर सोए हुए होते हैं तो आप चाय पकौड़े आदि बनाकर सबको जगाते हैं और खिलाते हैं। माँ भी बच्चे का इतना ध्यान नहीं रख सकती है, वो भी इतना नहीं कर सकती है। फिर वो तो 2-3 बच्चों को या फिर ज़्यादा-से-ज़्यादा 7-8 बच्चों का ही ध्यान रखती है, पर आप लाखों की संगत का माँ की तरह ध्यान रखते हैं, सबकी सुनते हैं, सबको हौंसला देते हैं; कोई भी मुसीबत आने पर खुद आगे आकर उसे अपने पर लेते हैं, उसका साथ देते हैं। बाहर से भी उसे हौसला देते हैं और अंदर से भी उसे दृढ़ कर देते हैं।
सिर पर बैठकर जो चाहते हैं करवा लेते हैं
पीरखोह जम्मू में रहने वाले एक गरीब लड़के की जायदाद उसके रिश्तेदार हथियाना चाह रहे थे। उसके पास घर में केवल माँ, जो सालों से बीमार चल रही थी, जो खाना तक भी बनाने में सक्षम नहीं थी, और उसकी दादी थी, जो मकान की मालकिन थी। उसने अपने सब बच्चों को अपना-अपना हिस्सा दे दिया था और अब जिस घर में वो रह रही थी, वो उसने उस लड़के के नाम किया हुआ था और अपनी जायदाद का वारिस उसे बताया था। पर रिश्तेदार उसकी दादी को अपने पास ले गये और वहाँ उनकी जायदाद को हड़पने का प्लॉन बनाने लगे। लड़के को एक-एक पाई के लिए तरसाया जाने लगा। उसे सत्संग सुनने के लिए किराया तक बड़ी मुश्किल से मिलने लगा। ऐसे में दुखी होकर उसने आपसे प्रार्थना की। आपने कहा कि दादी को अपने पास ले आओ। लड़के ने कहा कि जब भी वहाँ जाता हूँ तो सब मुझे घेर लेते हैं। मेरा कुछ नहीं चल पा रहा है। आप ही कुछ कृपा करें। आपने कहा कि भरोसा रखना।