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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु <span style="float: right;">73</span>

को अपनी सुरति भी देते हैं। सुरति देना यानी प्रेम करना। इसका सीधा मतलब है कि आपके दिल में निंदकों के प्रति कोई घृणा है ही नहीं। यदि होती तो आप उन्हें नाम नहीं देते। आपने तो अखनूर आश्रम पर हमला करने वालों को भी नाम दे दिया था। फिर जो बेचारा भोला आदमी केवल बातों से निंदा कर रहा है, उसके प्रति आप क्या घृणा कर सकते हैं। वो बेचारा तो स्वयं ही नरक की ओर जा रहा है। इसके बाद यदि आप उसके प्रति और बैर रखेंगे तो फिर तो उसकी मुक्ति जन्म-जन्मांतरों तक भी नहीं हो पायेगी। यही विचार कर आप किसी के प्रति बैर भाव नहीं रखते हैं। आप यही विचारते हैं कि हो सकता है कि उन्हें पता नहीं है; जब पता चलेगा तो वो भी आयेंगे।

सब आपके ही हैं। यह एक परम रहस्य है, जिसे दुनिया के साधारण जन समझ नहीं पायेंगे। इसी रहस्य के कारण आपके लिए कोई न दोस्त है, न दुश्मन। जो भी जब भी अपनी भूल पर पछचाताप करके आपकी शरण में पहुँच जाता है, आप सहज ही उसे क्षमा करके नाम रूपी दौलत प्रदान कर देते हैं।

शब्द नहीं देते हैं आप

आप कोई भी शब्द बेकार में नहीं बोलते हैं। आपके हरेक शब्द में वज़न होता है। आप कभी किसी को आशीर्वाद नहीं देते कि ‘युग युग जिओ।’ महात्मा लोग ऐसे आशीर्वाद दे देते हैं। पर सच यह है कि ऐसा आशीर्वाद देना झूठ बोलने के बराबर होता है। यह तो अपने सिर पर पाप लादने वाली बात है। क्योंकि यदि जुग-युग जीने का आशीर्वाद दिया तो युग-युग जीने की शक्ति भी देनी होगी। यदि ‘पुत्रवती भवः’ का आशीर्वाद दिया तो बेटा भी देना होगा, नहीं तो झूठ हो जायेगा। इसी कारण आप कोई भी आशीर्वाद नहीं देते हैं।