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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु | 87

क्योंकि आपके पास विभिन्न मत-मतान्तरों के लोग पहुँचते हैं। वो वहाँ ये सब करते हैं तो सोच बन गयी होती है कि इसी तरह से महात्मा लोग खुश होते हैं। इसलिए आप उन्हें समझाया करते हैं कि इन चीज़ों से भक्ति नहीं होती है। भक्ति दिल से की जाती है। दिल में श्रद्धा होनी चाहिए। आप तो यहाँ तक कहते हैं कि भूल कर भी फूल नहीं फेंकना। कुछ आपकी गाड़ी को हाथ लगाकर प्रणाम करते हुए चलते हैं। आप समझाते हैं कि ये बेकार की चीज़ें हैं, इनसे कुछ लाभ नहीं होने वाला है। गाड़ी को प्रणाम करने से क्या होगा!

जासूसी करने आए थे और भक्त बन गये

पंडित पी. आर. अवस्थी शास्त्री जी पहले पहल आपकी जासूसी करने आए थे। एक दिन वे आपके आगे लंबे लेट गये; कहा-मुझे अपनी शरण में ले लो; मैंने कई दिन आपकी जासूसी की है, पर अब मुझे दीक्षा दो; आज मैं जासूस बनकर नहीं आया हूँ; आज मैं भक्त बनकर आया हूँ।

इसी तरह सी. आई. डी. और आई. बी. के कई लोग आपके पास पहले जासूसी करने के मकसद से आए, पर जब आपकी असलियत पता चली तो आपके परम-भक्त बन गये।

दीनों के नायक हैं आप

आप दीन-दुखियों, गरीबों, पीड़ितों की रक्षा करते हैं। आप उन्हीं के हैं। आपने अमीरों को नहीं चुना; आपने गरीबों को चुना, उनका दर्द समझा और उसे दूर किया। एक भोली सी लड़की राँजड़ी में अपने मामा के घर रहने आयी थी। बगुना, सूचानी आदि के गुण्डों ने उसे देखा तो अपने गिरोह के सरदार को सूचना दी। उनका बड़े-बड़े नेता लोगों से भी संबंध था। वे रात को उसे उसके घर से ले गये। उसका पति भी वहीं था। लड़की बड़ी खूबसूरत थी। 10-12 गुण्डों ने मिलकर उसके