निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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फिर यासीम खाँ ने क्षमा माँगी। उसका मस्तिष्क कुंद पड़ गया। पर कमाल खुश नहीं हुए। उसने सोचा कि कबीर साहिब के पास जाते हैं; ये तो उनके शिष्य हैं। साहिब के पास गये तो साहिब ने कहा कि मैं माफ़ नहीं कर सकता; माफ़ी तो तेरा गुरु ही दे सकता है। पर तू उम्मीद से आया है, इसलिए तेरे साथ चलता हूँ। लाहौर पहुँचे। साहिब ने कमाल से कहा कि इससे गलती हुई है। कमाल ने कहा कि आप तो समरथ हैं, पर यह मृत्यु के 32 साल तक अमर लोक नहीं जा पायेगा। तब 32 साल के बाद उसकी रूह कब्र फोड़कर अमर-लोक गयी।
आज भी लाहौर में यासीम खाँ की कब्र है। साहिब समझा रहे हैं-
गुरु गूँगे गुरु बाँवरे, गुरु के रहिये दास।
जो गुरु भेजे नरक में, तो राखिये स्वर्ग की आस ॥
बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं आप
आप दिखावे की दुनिया से परे रहते हैं। आप अपने शरीर पर कोई अलंकरण धारण नहीं करते। न गले में फूल-मोतियों की माला, न माथे पर तिलक, न रँगा हुआ चोला, न लंबी-लंबी दाढ़ी, न लंबी-लंबी जटाएँ, न अन्य कोई स्वाँग। बाहरी दिखावे की इन चीज़ों से आप बिल्कुल दूर रहते हैं। आपका मानना है कि ये चीज़ें भक्ति की पहचान नहीं हैं।
इतना ही नहीं, आप अपने सामने अगरबत्ती नहीं जलाने देते। आप अपने गले में किसी को फूलों की माला नहीं डालने देते। आप किसी को अपने ऊपर फूल नहीं फेंकने देते। आप इन सब चीज़ों के लिए संगत को मना करते रहते हैं। मगर लोग हैं मानते ही नहीं जबरदस्ती गले में फूलों की माला डालते और आदर भाव से ऊपर फूल फेंकने लग जाते हैं।