निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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वो मर गया। कुछ देर बाद आपने सोचा कि देखते हैं कि कहाँ है। जब आपने देखा तो वो रेगीस्तान में गर्मी से तड़प रहा था। आपको दया आ गयी, सोचा कि कल्याण करूँ, पर फिर ख़्याल आया कि इसे तो अभी लाखों साल यहाँ सड़ना है। गुरु निंदा की यही सज़ा है। गुरु को नाराज़ करना ही नहीं है। आप समझाते हैं कि कभी यह मत सोचना कि गुरु को नाराज़ करके प्रभु की शरण में चले जायेंगे तो बच जायेंगे। नहीं! ऐसा नहीं होगा।
एक बादशाह के जहाँ यासीम खाँ बड़ी ऊँची पोस्ट पर था। वो कमाल जी का शिष्य था। मौलवियों ने बादशाह को शिकायत की कि इसे सज़ा देनी चाहिए, यह धर्म विरोधी बातें करता है। बादशाह ने कमाल को कहा कि ऐसा मत कहो; पर उन्होंने वही कहा। तो बादशाह ने कहा कि इसे ले जाकर चौराहे पर बाँध दो और हर आने-जाने वाले को कह दो कि इस पर पत्थर फेंके, थूके या मारे। जो नहीं मानेगा, उसे भी इसके साथ बाँध देना और उसके साथ भी यही कार्रवाही करना।
लोग आते गये और उनपर कुछ-न-कुछ फेंकते रहे; पर कमाल जी मुस्कराते रहे। यासीम खाँ उनका शिष्य था; वो भी संयोग से वहाँ से निकला। तो सिपाहियों ने कहा कि यह बादशाह का हुकुम है; आप तो हमारे अधिकारी हैं। पर कोई हमारी शिकायत कर देगा तो हमारी भी ख़ैर नहीं है, इसलिए कुछ भी मार दें। यासीम खाँ डर गया; उसने फूल की एक पखुण्डी उठाई और गुरु जी पर धीरे-से फेंका। कमाल ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। यासीम खाँ ने कहा कि गुरु जी, लोग आपको पत्थर मार रहे थे, आपपर थूक रहे थे, पर आप मुस्करा रहे थे। मैंने आपपर फूल फेंका तो आप रोने लग गये। कमाल ने कहा कि वो अनजान हैं, मुझे नहीं जानते, पर तू तो मेरी रुहानी शक्तियों को जानता था, इसलिए यह चोट मेरे दिल पर लगी है। तू भी यहीं बँध जाना था मेरे साथ। तब तेरा नाम भी मेरे साथ अमर हो जाना था।