निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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साहिब बन्दगी
दिया। वो आपको आने नहीं देना चाह रहे थे, पर आप आधे घण्टे बाद उठकर चल पड़े।
फिर बाद में उन्होंने आपको फ़ोन किया, कहा कि आपने आधे घण्टे में मेरी कई शंकाओं का निराकरण कर दिया। अब मुझपर कृपा करो और बताओ कि मैं कहाँ पर दीक्षा लेने आऊँ?
कहने का भाव है कि आप हरेक की शंकाओं को बहुत ही कम समय में मिटा देते हैं। पर कोई समझने वाला हो। यही कारण तो है कि आपके पास विभिन्न पंथ वाले अपने-अपने पंथों को छोड़कर आपके पास चले आते हैं, क्योंकि अध्यात्म के विषय में जो खोजी होते हैं, उनकी तो कई शंकाएँ रहती हैं। जब उनकी शंकाएँ अपने पंथ में नहीं मिट पाती हैं तो वे उन शंकाओं को लेकर आपके पास आते हैं। आप जब उन शंकाओं को मिटा देते हैं तो वे प्रभावित होकर आपसे नाम ले लेते हैं; वे समझ जाते हैं कि आपके पास सच्चा ज्ञान है, केवल किताबी ज्ञान नहीं।
आपको नाराज़ करना ठीक नहीं
आप किसी से नाराज़ होना ही नहीं चाहते हैं। पर जब होते हैं तो परेशान हो जाता है वो। आपकी नाराज़गी दिल में खलबली मचा देती है। पर यदि ज़्यादा हो गये तो पागल हो जायेगा बंदा और यदि बहुत ज़्यादा हो गये तो फिर तो मर ही जायेगा।
आपके गुरु ने आपको गद्दी देते समय कोई ज़्यादा समझाया नहीं कि ऐसे-ऐसे करना। बस, उन्होंने एक शब्द लिया, कहा कि मेरे बेटों से नाराज़ नहीं होना। क्योंकि वे जानते थे आपकी नाराज़गी को।
एक नामी ने आपकी सेवा की, ज़मीन दान में दी, पर वो कहीं अहंकार में आकर बदतमीजी कर गया। आप उससे दिल से नाराज़ हो गये; बहुत नाराज़ हो गये। बेटा बाप को चाँटा मार दे तो कैसा है!