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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु
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आप कोई बॉडिगार्ड लेकर घूमने वाले या बुल्ट प्रूफ में बैठकर सत्संग करने वालों में नहीं हैं। आप सच्चे संत हैं, जिन्हें इस नश्वर शरीर की कोई परवाह नहीं है। इस नश्वर शरीर के मिटने का डर तो उसे होता है, जिसे आत्मा का ज्ञान नहीं मिल पाया हो। आप तो कहते हैं कि यदि यह शरीर नहीं भी रहा, मैं तो भी अपनी संगत से मिल लूँगा। इसलिए आप बिना किसी डर के, बिना अपनी जान की चिंता किये दीनों के लिए लड़ते हैं, उन्हें इंसाफ़ दिलाते हैं।

फौज में रहे शान से

आपने फौज की नौकरी बड़े शान से की। वहाँ सबसे माँस कटाया जाता था, पर आप नहीं काटते थे। आप सैनिक थे जो कमाण्डर था, उसने कहा कि माँस काटना है सबने। आपने कहा कि मैं खाता नहीं हूँ तो काटूँ क्यों? जो खाते हैं, उन्हीं को कहो। उसने कहा कि मैं चार्ज शीट पर लिख दूँगा। आप नहीं डरते थे, कहा कि लिख दो। पर कभी आपको सज़ा नहीं हो पाती थी। आपने किसी के साथ समझौता नहीं किया। वे जानबूझ कर करते थे। फिर जब दूसरा कमाण्डर था तो माँस को मच्छरदानी में रखकर काटते थे, ताकि मक्खियाँ न भिनभिनाएं तो सबको काटना होता था और सबकी मच्छरदानी का इस्तेमाल किया जाता था। पर आपने कभी अपनी मच्छरदानी नहीं दी। आपने कहा कि मैं खाता नहीं हूँ, मच्छरदानी क्यों दूँ? खून के छींटें पड़ते हैं और मुझे बदबू आती है। कमाण्डर ने कहा कि फिर लड़ाई कैसे करनी है? आपने कहा कि वो दूसरा मुद्दा है; वहाँ दुश्मन को मारकर खाना थोड़े है। आपके तर्क के आगे सब झुक जाते थे। वे कोई सज़ा भी नहीं दे पाते थे।

जब आप नाचे.....

31 दिसंबर का दिन, अखनूर आश्रम में विशाल प्रोग्राम और आप मौज में थे। जैसे ही आप झूमे तो संग ही आश्रम का कुल्ला भी झूमने

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