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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 131 of 1282

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१३२ अ० १ पा० ५ ख० १ । सूर्य ऋषि । अनुष्टुप् छन्दः । विवाहमें विनियोग ॥ इसी अपने घरमें तुम दोनों स्त्री-पुरुष मोद या हर्षयुक्त हो। तुम कभी वियुक्त न हो। बेटे और पोतोंके साथ क्रीड़ा करते हुए, पूर्ण आयुको भोगों। यह आशीर्वाद है। विवाह कर्मका समस्त प्रयोजन इस मंत्रमें स्पष्ट वर्णन किया है। (पूर्वपक्षका खण्डन) सिद्धान्तीने मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको स्थापना कर दी, अब पर पक्षमें जो हेतु हैं, उनका खण्डन करते हैं। १—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें पहिला हेतु यह दिया है कि—उनमें शब्द तथा उनका क्रम नियत रहता है, हम कहते हैं कि—अर्थवाले लौकिक शब्दोंमें भी ऐसा देखा गया है, जैसे कि—"इन्द्राग्नी” "पितापुत्रौ”। जबकि—लौकिक शब्दोंमें भी नियत प्रयोग होते हुए कोई शब्द अर्थवान् है, तो मन्त्रोंको अनर्थकताके लिये वही हेतु अनैकान्तिक अथवा व्यभिचारी है। इससे मन्त्र अर्थवान् ही हैं। २—दूसरा हेतु यह कि--‘ब्राह्मणसे रूपसम्पन्न या अर्थके बोधक होते हुए भी मन्त्र विधान किये जाते हैं’ ठीक नहीं। क्योंकि- उसका यह प्रयोजन नहीं कि—'मन्त्र अपने स्वरूपसे अपनेको ही विधान करनेमें समर्थ है, इस लिये उसको ब्राह्मण विधान करता है,’ बल्कि—मन्त्रके कहे हुए अर्थको ही, उसकी विस्तारसे प्रशंसा या अनुमोदन करनेकी इच्छासे अनुवाद करता है। अर्थात् लोक, एकवार, संक्षेप तथा बिना प्रशंसाके कहे हुए अर्थको ग्रहण नहीं करता, इसीसे मन्त्र जिस अर्थको एकवार संक्षेपसे प्रशंसाके बिना कहा जाता है, उसीको ब्राह्मण दुबारा विस्तारसे प्रशंसा पूर्वक कह देता है, और यह भी है कि—जबतक कोई बात कही हुई न हो, अचानक उसकी प्रशंसा नहीं होसकती, इसलिये जिस अर्थकी

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