Skip to content
BharatKosha
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 132 of 1282

Read in context
Page 132

हिन्दी निरुक्त । १३३ ब्राह्मण प्रशंसा करे, वह अर्थ पहिले किसोका कहा हुआ होना चाहिये, किन्तु ऐसी आकांक्षाको सहजन्मा मन्त्रके अतिरिक्त और कौन पूरीकर सकता है। फल यह निकला कि—'मन्त्र अर्थवान् होकर भी ब्राह्मणसे विहित होता है, इससे वह अनर्थक नहीं होना चाहिये, प्रत्युत ब्राह्मणकी अर्थवत्ताके लिये उसे अर्थवान् होनेकी बड़ी आवश्यकता है। इस निर्णयके अनुसार कौत्सके मतमें, 'जो ब्राह्मणका अर्थवत्ता मन्त्रको अनर्थक बनाती थी,स्वयम् वही अब मन्त्रकीअर्थवत्ताके अनर्थक बनाती थी, स्वयम् वही अब मन्त्रकी अर्थवत्ताके बिना अपने ठहरनेका कोई आधार नहीं पाती। इस प्रकार ब्राह्मणकी अर्थवत्ताकी सहचरी बनकर मन्त्रकी अर्थवत्ता निर्विशङ्क विराजती है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणकी अर्थवत्ता यो भी है कि—किसी किसी प्रकरणमें समानलिङ्ग अनेक मन्त्र होते है,जो सब समानरूपसे एकही कर्मको बोधन करते हैं, इससे या तो वे सभी कबूतरोंके समान एकदम उस कर्ममें आवें, या उनका विकल्प हो ? वैसे स्थलमें किसी अभिमत एक मन्त्रका नियम कर देता है कि—इस कर्ममें यही मन्त्र लिया जाय। इस प्रकार ब्राह्मणकी स्वतन्त्र आवश्यकता है, उसके कारण मन्त्र अनर्थक नहीं हो सकते। इससे सिद्ध हुआ कि—"मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही अर्थवान् हैं। ३—जोकि--यह कहा कि—"ओषधे त्रायस्वैनम्” “स्वधिते मै॒नं॒ हिं॑सीः” इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ उत्पन्न नहीं होता इस लिये मन्त्र अनर्थक है' ? ठीक नहीं है। क्योंकि—जहां केश या वृक्ष आदिके छेदनमें यह मन्त्र विनियुक्त है, वहां इस मन्त्रके द्वारा ओषधिके अधिदेवताको स्तुति की जाती है और उसीसे जजमान और वृक्ष आदिकोंके प्राणकी प्रार्थना है। जिससे कि—देवताकी