निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त। १३५ हम समझते हैं कि-ठीक यही अभिप्राय निम्न लिखित मार्क- ण्डेयपुराणके सप्तशती स्तोत्रमें भी दिखाया है । "एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । संग्राम मृत्यु मधि- गम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेतिनून महिमान्विति- हंसि देवि !" (४,१८) । अर्थ:-"हे देवि ! संसारमें अशान्तिके उत्पन्न करनेवाले इन राक्षसोंको तुम समदर्शिनी होकर भी इसलिये मारती हो कि- 'इनके मरनेसे सब जगत् सुखी हो, तथा ये (दैत्य) नरकमें जानेके लिये बहुत कालतक पाप करें, इसकी अपेक्षा संग्राममें मृत्युको प्राप्त होकर, स्वर्गमें जावें, अच्छा होगा ।” अर्थात् भगवती उनके अनिष्टके लिये नहीं प्रत्युत उनके अभ्युदयके लक्ष्यसे उनका वध करती है इसी तात्पर्यके साथमें भगवान् वेद भी वृक्षादिकोंकी हिंसाका विधान करता है। इस रीतिसे मंत्रोंमें ऐसा कोई अर्थ नहीं जो अनुपपन्न हो, अतः मंत्र अर्थवान् हैं। (५) परस्पर विरुद्ध अर्थके उदाहरणसे भी मंत्रोंकी अन- र्थकता नहीं है, क्योंकि-यह बात दैवतकाण्ड (७, १, ४) में स्पष्ट कही जायगी कि-'देवता महाभाग्यके योगसे एक भी अनेक होजाती है और अनेक होती हुई एक । इस कारण एक रुद्र अनेक रूप होसकतो और अनेक एक, इसलिये मंत्रोंमें कोई ऐसा विरोध न होनेसे मंत्र अर्थवान् हैं । (६) इन्द्रके शत्रुरहित होने और उसके सैकड़ों शत्रुसेनाओंके जीतनेका प्रश्न भी युक्त नहीं, क्योंकि-लोकमें भी “असपत्नोऽयं ब्राह्मणः” 'यह ब्राह्मण शत्रु रहित है' “अनमित्रोऽयं राजा” 'यह