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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 135 of 1282

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Page 135

अ० १ पा० ५ ख० १ ।

राजा वैरीशून्य है' इत्यादि व्यवहार प्रसिद्ध हैं। किन्तु लोकमें कोई शत्रुरहित नहीं है। जैसाकि—कहा है— मुनेरपि वनस्थस्य स्वाति कर्माणि कुर्वतः । उत्पद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीन शत्रवः । अर्थ—मुनि जो वनमें रहकर केवल अपने कर्मोंको करता है, उसके भी मित्र उदासीन और शत्रु ये तीन पक्ष उत्पन्न होजाते हैं। तथापि किसीको कोई स्वल्पशत्रु देखकर ऐसा कह देता है कि- ‘वह अशत्रु है’ इसी प्रकार जब इन्द्रने किसी बड़े भारी मेघका हनन किया, उस समय अन्यमेघोंकी असारता जानकर कह दिया कि-- हे इन्द्र ! अब तू अशत्रु होगया, जैसा कि--किसीके भारी शत्रुके नष्ट होजानेपर क्षुद्र शत्रुओंके रहते हुए भी उसे अशत्रु कहा जावे, उसीके समान इंद्रकी अशत्रुता भी होसकती है। यद्यपि देवताओंके कोई शत्रु नहीं होते, बल्कि—वे विभुस्व- तंत्र तथा महिमावाले होते हैं तथापि सैकड़ों सेनाओंके जीतनेकी स्तुति कल्पनामात्र है। क्योंकि—आगे कहेंगे कि-“जल और ज्योतिः के योगसे वर्षण कर्म होता है” वहां उपमाके लिये युद्धका वर्णन होता है” (नै० का० २, ५, २) । इसलिये हे कौत्स ! तुम्हे यह ठीक नहीं दिखाई देता, निरुक्तके जाननेवालोंसे देवता तत्वको समझो, उसीसे तुम मन्त्रोंके अर्थोंको विरोध रहित जान सकोगे। इस प्रकार (जैसाकि—तुम करते हो) वाक्यके तत्वके न जाननेवालेसे मन्त्रार्थ अवगाहन नहीं किया जा सकता। क्योंकि—वेदके पदार्थ गम्भीर हैं। कैसे जानोंगे ? वेदार्थके विचारमें भ्रान्त वादियोंने ही अपनी बुद्धिके लाघवके प्रकट करने के लिये सर्व-वर्णा साधारण दर्शनोंको प्रतिपादन किया है, उन्हींके चक्रमें तुम भी कहीं पड़ गये हो। अतः तुमने जो कहा है