निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त । १३ (३) नाम और आख्यात वाच्य अर्थसे अर्थवाले है तथा उपसर्ग और निपात द्योत्य अर्थसे। इससे पहिला समु- दाय प्रधान और दूसरा गौण है। वाच्य अर्थ अपना निजका अर्थ होता है और द्योत्य अर्थ दूसरे शब्द का होता है तथा दूसरे शब्दसे प्रकाशित होता है। वाचक शब्द अपने अर्थ का कहने वाला होता है, और द्योतक शब्द दूसरे शब्दके अर्थ को केवल प्रका- शित करता है, वस्तुतः उसका कोई अर्थ नहीं होता, जैसे “सर्प का बिल और हिन्दुस्तानमें कंजरका घर" इस वाक्य का। दो दोको समस्त करने का हेतु। (१ नाम आख्यात) (१) नाम और आख्यात परस्पर आकांक्षा रखते है, इसीसे आचार्यने इनका समस्त निर्देश किया है। जैसे—'यज्ञदत्तः' यह नाम शब्द तभी तक साकांक्ष है, जब तक 'पचति' 'पठति' इत्यादि आख्यात उसके सामने जोड़ कर उसकी आकांक्षा न मिटाई जावे। तथा 'पचति' यह आख्यात शब्द तभी तक सापेक्ष है, जब तक 'यज्ञदत्तः' यह नाम शब्द उसकेसाथ नहीं जोड़ा जावे। अर्थात् व्यवहारमें दोनों साथ ही रहते है, जैसे—पचति यज्ञदत्तः ओदनम् । इसलिये इनके इस नित्य सम्बन्धको सूचन करनेके लिये इनका समास निर्देश किया। (२) नाम और आख्यात दोनों ही वाच्य अर्थसे अर्थवान् होते हैं, इनके इस सादृश्यको जतानेके लिये इनका समास किया गया है, अन्यथा अलग अलग भी कहे जा सकते थे।