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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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१४ अ० १ पा० १ खं० १ । ० ( २ उपसर्ग निपात ) “उपसर्ग --निपाताः” यह उपसग और निपात दोनोंका समास निर्देश है, इनका पृथक् एक समासमें संयोजन ‘इस प्रयोजन से किया गया है कि ये दोनो नाम और आख्यातके अर्थ विशेषके द्योतन( प्रकाशन ) रूप समान कार्य्य को करते हैं । एक एकके पूर्वापरका निर्णय । ( १ नाम ) पहिले निश्चित हो चुका है कि चारोंमें दो नाम और आख्यात प्रधान है, इसलिये ये दो सबमें पहिले कहे गये, किन्तु इनमें भी नाम पदके प्रथम प्रयोगका कारण अल्पस्वरता है। जिस शब्द मे स्वर कम होते हैं, वह पद द्वन्द्वसमासमें पूर्व रहता है। यह व्याकरण का नियम है। ( २ आख्यात ) 'आख्यात' पद 'नाम' पदके अनन्तर इस कारण किया गया कि वह नामके कारक रूप अर्थ में रहने वाली क्रियाको कहता है । ( ३ उपसर्ग ) आख्यातका सहयोगी होने से उपसर्ग का पाठ आख्यातके अनन्तर किया गया है । ( ४ निपात ) परिशेषसे निपातका पाठ या प्रयोग सबसे पीछे हुआ । इन युक्तियोंके बल पर यास्क मुनिने इन सबको।