निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त । १५ “नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च” इस क्रमसे कहा है । आख्यात का लक्षण । “तत्रैतन्नामाख्यातयो र्लक्षणं प्रदिशन्ति, भावप्रधान-माख्यातम्” । (क) आख्यात जो 'पचति' 'पठति' इत्यादि क्रिया रूप है, उस में द्रव्य और क्रिया दो अर्थ रहते हैं। जैसे-'पचति' मे पाक और पकानेवाला, तथा 'पठति' मे पढ़ना और पढनेवाला। यहां पाक ओर पढ़ना क्रियाएं हैं और पाक करनेवाला तथा पढ़नेवाला पुरुष आदि द्रव्य होता है। इन दोनों मे क्रियां या भाव प्रधान (विशेष्य) होता है, और द्रव्य अप्रधान या विशेषण होता है। इसीसे आख्यातको भाव-प्रधान कहते हैं, और यह भाव-प्रधानताही उसका लक्षण या पहिचान है। अर्थात् जहां इस प्रकारसे भाव-प्रधानता होगी वह आख्यात होगा। आख्यायते प्रधानभावेन क्रिया (भावः), गौणत्वेन द्रव्यं च यत्र तदाख्यातम् । (ख) जिस पदमें गौण भावसे क्रिया और उस पर प्रधान भावसे भाव कहा जावे, उसको आख्यात कहते हैं। इस मतमें पूर्व मतसे यह विशेष है कि-उसमें कारक या द्रव्यकी अपेक्षा से भावकी प्राधनता है, और इसमें क्रियाकी अपेक्षा से भावकी प्रधा- नता है। पूर्व मतमें क्रिया और भावका अभेद है और यहां भेद है। क्रिया नाम व्यापारका है, वह सदा ही परिच्छिन्न द्रव्यमें आश्रित रहती है। क्रियासे सम्बन्ध रखनेवाले द्रव्यको कारक