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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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१६ अ० १ पा० १ ख० १ । कहते हैं, उसके कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण. ये छः भेद होते हैं। एक ही क्रिया सम्बन्धके भेदसे अनेक कारकविशेषोंका हेतु हो जाती है। जैसे—एक स्त्री सम्बन्धके भेदसे पति और पुत्र आदि विशेष नामोंका कारण बन जाती है। जो उसमें गर्भ रखता है वह पति और जो उसका या उसमें गर्भ है वह पुत्र, इसी प्रकार पाक क्रियामें जो पकाता है, वह कर्त्ता, जो पकाया जाता है वह कर्म, जिसमें तण्डुल रखकर पकाया जाता है, वह अधिकरण और जिसके लिए पकाया जावे वह सम्प्रदान इत्यादि रीतिसे कारक-भेद हो जाते हैं। पचनानुकूल क्रिया एक ही समयमे पाचक (पकानेवाला) ओदन (भात) और स्थाली (बटलोई) में भिन्न २ सम्बन्धसे उन की कर्त्ता, कर्म और अधिकरण संज्ञाको उपपन्न करतो है। और वह समान कालमें ही इस तरह विभक्त रहती हुई ओदनमें पाक रूप भावको उत्पन्न करनेके लिए उन्मुखो प्रतीत होती है। वहाँ पाक रूप फलकी प्रधानता और कारणभूत जो पाकानुकूल क्रिया है, उसकी गौणता प्रतीत होती है। क्रिया पर भावकी प्रधानता । आख्यातमें भावकी अपेक्षा से क्रियाकी गौणता इस लिए है, कि वह भावकी सिद्धि ही के लिए आत्म लाभको धारण करती या उत्पन्न होती है, जब वह तण्डुल आदिमें पाक नामक भावको उत्पन्न कर देती है, तो अपना प्रयोजन पूरा हो जानेसे एक देश (चावलका वह भाग जो सबसे पीछे गलता है) में ही अन्तर्द्धान हो जाती है। जिसका जिसके लिए आत्मलाभ (उत्पत्ति) होता है, वह उसका गुणभूत या विशेषण होता है। भाव सिद्धिके लिए ही क्रियाका आत्मलाभ होता है। इसी से