निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त । १६७ “न” इव । समान । “भीमः” विभ्यति अस्मात् । जिससे अन्य प्राणी या शत्रु डरें 'ञिभी' भये धातुसे बनता है । “भीष्मः” यह शब्द मन्त्र और उसकी व्याख्यामें नहीं है, किन्तु 'भीम' शब्दके सादृश्यसे आया है । वही धातु और वही अर्थ है । “कुचरः” (१) 'चरति कर्म कुत्सितम्' निन्दित कर्मका करनेवाला । (२) देवताके पक्षमें 'क्वायं न चरति' कहां नहीं जा सकता ? अर्थात् सब स्थानोमें विचरनेवाला । “गिरिष्ठाः” 'गिरिस्थायी' पर्वतमें रहनेवाला । “गिरिः” 'पर्वतः' पहाड़ । क्योंकि—वह पृथ्वीसे उगला हुआ रहता है । “पर्वतः” 'पर्ववान् भवति' क्योंकि—उसमें शिला शिखरों- की सन्धियां रूप पर्व रहते हैं । “पर्व” (१) 'पृणाति पर्वतम्' 'पृ' धातु (पूरणार्थक) से बनता है । क्योंकि—शिलाओंके शिखरोंकी सन्धियां पर्वतको पूर्ण या व्याप्त कर देती हैं (२) अथवा प्रीञ् तर्पणे धातुसे बनता है, पूर्णिमा या अमावस्याका नाम है। क्योंकि—इनमें देवताओंकी तृप्ति की जाती है। जिस प्रकार 'पर्व' शब्दका शिलासन्धिके अतिरिक्त अह्न मास सन्धि या पक्ष सन्धि अर्थ हो जाता है, वैसे ही 'गिरिष्ठा' शब्द- का भी 'पर्वस्थायी' अर्थके अतिरिक्त 'मेघस्थायी' भी होता है, क्योंकि—मेघ भी अन्तरिक्ष या आकाशमें उगला हुआ होता है, इससे