निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context१६८ अ० १ पा० ६ ख० ६ । वह 'गिरि' शब्दका वाच्य होता है। यह अर्थ देवपक्षमे लिया जाता है अर्थात् पर्वतमें सिंह और मेघमें इन्द्र रहता है, इसलिये यह विशेषण दोनों पक्षोंमे उपयुक्त होता है। उपसंहार । निरुक्त शास्त्र उक्त रीति के अनुसार तीन प्रकरणोंमें विभक्त है। नैघण्टुक, नैगम, और दैवत। मन्त्रोंमें सर्वत्र ही दैवता पद मुख्य या विशेष्य होता है, क्योंकि-उनमें देवताओंकी स्तुति ही होती है, इसलिये देवता पदोंके अतिरिक्त सब पद देवताकी प्रशंसाके लिये होते हैं, इससे वह सब विशेषण होते हैं, मन्त्रोंमें प्रधानतासे जिनकी स्तुति की जाती है वे देवता है, उनके नाम जो 'अग्नि' आदि 'देवपत्नी' पर्यन्त १५१ शब्द है, एक स्थानमे संग्रह किये हुए हैं, वे ही मन्त्रोंमे विशेष्य पदके रूपमे आते है। ये ही समुदित शब्द 'दैवत' इस रूढ संज्ञासे बोले जाते हैं। इनकी व्याख्या शास्त्रके अन्त या पिछले भागमें की जावेगी, क्योकि-विशेषण शब्दोंके अर्थ- ज्ञानके पश्चात् उनके अर्थ के जाननेमे सुभीता रहेगा, इसके अति- रिक्त यह भी है कि-"निघण्टु" ग्रन्थमें कुल १७७० शब्द है, उनमें १५१ शब्द देवताओंके वाचक या विशेष्य है, शेष १६१६ शब्द विशे- षण हैं, इस रीतिसे विशेषण शब्दोका संख्या अधिक होने पर भी व्याख्या अल्प और सुगम है, एवम् दैवत शब्दोकी संख्या अत्यल्प होनेपर भी व्याख्या अधिक और गम्भीर तथा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है, इस बुद्धि गौरवके कारण ही दैवत काण्डकी व्याख्या अन्तमें ही की जायगी। यहां पर पहिले नैघण्टुक तथा नैगम प्रकरणमें विशेषण शब्दोकी व्याख्या की जायगो। आचार्यने इस बात पर बड़ा ही ध्यान रखकर निरुक्तशास्त्रकी रचना की है, कि-मनुष्योंको इस शास्त्रके द्वारा देवता तत्त्वका,