निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त । १६६ परिज्ञान तथा उससे मिलनेवाले फलका लाभ किस प्रकार सुख- पूर्वक हो ? 'गोः' पदसे आरम्भ करके "देवपत्न्यो" पर्यन्त जो कुल शब्द इस शास्त्रमें हैं, उन सबका "निघण्टु" नाम है, उसके एक भागको “नैघण्टुक” कहते हैं, जिसमें “गोः” पदसे आरम्भ कर 'जहा” शब्दसे पूर्व पूर्व परिगणित शब्द आये हैं । इस शास्त्रकी लोक व्यवहारसे "निघण्टु" सञ्ज्ञा, और उसके उपर्युक्त भागके प्रथम अध्यायमे तृतीय अध्याय पर्यन्त ग्रन्थके रूपमें है, भाष्य व्यवहारसे "नैघण्टुक” संञ्ज्ञा है । "जहा" शब्दसे ( पीछे और "अग्निः” पदसे पूर्व ) पूर्व जितने शब्द हैं, वे सब मिलकर "नैगम" और ऐकपदिक इन दो संञ्ज्ञाओंसे व्यवहृत होते हैं। यह प्रकरण निघण्टु शास्त्रके चतुर्थाध्यायके रूपमें है। इन दोनों प्रकरणोंमें नैघण्टुक तथा नैगम शब्दोंकी व्याख्या होगी। षष्ठः पादः समाप्तः । प्रथमाध्यायश्च परिसमाप्तः ।