निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context२ २ अ० १ पा० १ खं० । और संस्कार समर्थ या समान अर्थमें हों, और प्रादेशिक या क्रिया-वाचक धातुसे संयुक्त हों, वहां उन्हें उसी प्रकार निर्वचन करे। यदि और ही प्रकारका अर्थ हो, और और ही प्रकारका शब्द हो, तो अर्थ प्रधान होकर, किसी क्रिया या गुणकी समानता को लेकर, शब्दकी व्याख्या या निर्वचन करे। यदि वैसी भी समानता न पावे, तो अक्षर या वर्णका सादृश्य लेकर ही निर्वचन करे। किन्तु 'न निर्वचन करे और न संस्कारका आदर करे'— ऐसा न हो। क्योंकि—शब्दकी वृत्तियां संशय युक्त होती हैं। [इसी प्रकार] विभक्तियोंका अर्थके अनुसार विपरिणाम करना। 'प्रत्तम्' 'अवत्तम्' यहां पर धातुके आदि अक्षर ही शेष रहते हैं ॥१॥ व्याख्या “अथ निर्वचनम्” । नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातका लक्षण कहकर, शास्त्रके अप्रयोजन, प्रयोजन-सहित वेद तथा वेदाङ्गोंके भेद, तीन प्रकरणोंके विभागसे, निघण्टु समाम्नायकी रचना बताकर, दैवत-काण्डको अवशेष रखकर, नैघण्टुक तथा नैगम दोनों काण्डोंको साम्हने रख कर कहा है कि—इनमें नैघण्टुक और नैगम शब्द कहे जायेंगे। किन्तु निर्वचनके लक्षणके बताये बिना उनकी व्याख्या नहीं हो सकती। इस कारण पहिले निर्वचनका लक्षण या उन शब्दोंकी व्याख्या करनेके नियम कहते हैं। यह निर्वचन—परोक्षवृत्ति और अतिपरोक्षवृत्ति शब्दोंमें धातु-प्रत्यय आदिके विभाग दिखाकर, उनके अर्थको कहना ही, निर्वचन है। यहां दो प्रकारके शब्द हैं, समर्थ-स्वर-संस्कार और असमर्थ- स्वर-संस्कार। १—इनमें जो प्रथम 'समर्थ-स्वर-संस्कार' शब्द हैं, जिनमें कि— स्वर (उदात्त, आदि) और संस्कार (प्रत्यय, आदि) क्रिया-